डूरंड लाइन के दोनों किनारों पर बारूद की गंध तो कम हो गई है, लेकिन तनाव जरा भी कम नहीं हुआ है. अफगानिस्तान-पाकिस्तान की ताजा भिडंत ने इस इलाके के वर्षों पुराने इतिहास और लगभग उतनी ही पुरानी अदावत को ताजा कर दिया है. 26 फरवरी की रात को अफगानिस्तान-पाकिस्तान ने डूरंड लाइन के किनारे मौजूद एक दूसरे की चौकियों को बमों से पाट दिया.
अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बीच जहां जंग हुई है वहां इलाके भूगोल जंग के नतीजे तय करता है. दरअसल टैरेन यहां का राजा है. यहां का टैरेन दुश्मन को छकाता है, हमलावर को थकाता है, और जो यहां की वादियों से वाकिफ है उसे पुरस्कृत करता है.
पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने जमीन के बंटवारे के लिए यहां डूरंड लाइन के नाम से लकीर तो जरूर खींच दी है, लेकिन कबीलाई संस्कृति से प्रभावित इस इलाके में लाइनों का ज्यादा महत्व नहीं है. अफगानिस्तान डूरंड लाइन को औपचारिक मान्यता नहीं देता है. यहां की चौकियां पर कब्जा उसी का होता है, जिसके पास ताकत होती है. यही वजह है कि दो मुल्कों के बीच 2640 किलोमीटर लंबी इस सीमा रेखा पर जिस मुल्क की जहां मर्जी होती है वहां घुस जाता है. जब चाहे चौकियों पर कब्जा कर लेता है. क्योंकि यहां अफगान-पाकिस्तान की संप्रभुता महज लकीर के खींच देने से नहीं बल्कि ताकत से तय होती है.
26-27 फरवरी की लड़ाई में पाकिस्तान का दावा है कि उसने दर्जन से ज्यादा चौकियां नष्ट कर दी है और कुछ चौकियों पर कब्जा कर लिया है.
इनमें अंगूर अड्डा में अफगान अल्फा पोस्ट, अफगान चार्ली पोस्ट, अफगान बाबरी पोस्ट को नष्ट या कैप्चर करने का दावा पाकिस्तान ने किया है.
अफगानिस्तान के पक्तिया प्रांत में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के अंदर 5 पोस्ट्स कैप्चर करने का दावा किया है. इनमें दो पोस्ट सावल के सामने और जर्मलान के सामने के पोस्ट भी शामिल हैं.
अफगानिस्तान और तालिबान प्रशासन ने भी दावा किया है कि उनकी सेनाओं ने पाकिस्तानी सेना के कई पोस्टों पर भारी जवाबी कार्रवाई के दौरान 19 चौकियों पर कब्जा किया है. इनमें नूरिस्तान के पोस्ट, खोस्त का पोस्ट अंजार सार, तोरखम गेट में पोस्ट शामिल हैं.
डूरंड लाइन 1893 में खींची गई वह रेखा है जो पहाड़ों, रेगिस्तानों और जंगलों से होकर गुजरती हैं. लेकिन यहां सीमा का मतलब सिर्फ नक्शा नहीं, यहां सीमा तभी पक्की है जब उस पर आपका कंट्रोल है, और इस कंट्रोल के लिए ताकत चाहिए.
आइए डूरंड लाइन पर मौजूद कुछ पोस्ट के भूगोल को समझते हैं.
अंगूर अड्डा
अंगूर अड्डा डूरंड लाइन पर स्थित एक महत्वपूर्ण बॉर्डर क्रॉसिंग है.यह पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के साउथ वजीरिस्तान जिले में स्थित है और अफगानिस्तान के पक्तिका प्रांत के बरमल जिले से सटा हुआ है. इसका नाम “अंगूर अड्डा” अंगूर की वजह से है.
यह इलाका ऊंचाई पर स्थित है. समुद्र तल से लगभग 2,254 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अंगूर अड्डा का टैरेन पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ है. हालांकि यह पक्तिका और वजीरिस्तान के बीच कुछ आसान दर्रो में से एक है. यहां से व्यापार, तस्करी और सैन्य गतिविधियां समांतार स्तर पर होती है.
26-27 फरवरी की झड़पों में पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने अंगूर अड्डा सेक्टर में अफगान चेकपोस्ट्स पर कब्जा कर लिया है.
अफगान बाबरी पोस्ट
अफगान बाबरी पोस्ट डूरंद लाइन पर स्थित एक बॉर्डर चौकी है,ये मुख्य रूप से अंगूर अड्डा सेक्टर में आती है. यह अफगानिस्तान के पक्तिका प्रांत के बरमल जिलेमें स्थित है और पाकिस्तान के साउथ वजीरिस्तान
भूगोल की दृष्टि से यह इलाका पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ है. आसपास घाटियां, पहाड़ी ढलानें और संकरी राहें हैं, यहां की ज्योग्राफी पर कंट्रोल बनाए रखना मुश्किल है. उचाइयां डिफेंसिव फायदे देती हैं, जबकि घाटियां छुपकर हमलों के लिए उपयोगी है. ये ऐसी जगहें जहां पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच टकराव होता रहता है.
अंजार सार पोस्ट
अंजार सार पोस्ट जिसे अक्सर अंजार सार के नाम से जाना जाता है, खोस्त प्रांत के अलीशेर-तेरेज़ी जिले में स्थित एक बॉर्डर चौकी है. हाल की झड़पों में अफगानिस्तान तालिबान ने इसे पाकिस्तानी “मेजर हेडक्वार्टर” के रूप में कैप्चर करने का दावा किया है.
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भूगोल की दृष्टि से यह क्षेत्र पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ है. खोस्त प्रांत का अधिकांश भाग खोस्त बाउल नाम की घाटी में आता है, जो आसपास की ऊंची पहाड़ियों से घिरा है. यहां पहाड़ियों की औसत ऊंचाई लगभग 1,200-1,700 मीटर है. जबकि आसपास की चोटियां 2,500-3,500 मीटर तक पहुंचती हैं. यहां का टैरेन संकरी घाटियां, पहाड़ी ढलानें और ऊंची रिज शामिल हैं.
यह इलाका पूर्वी अफगानिस्तान के खोस्त में है, जो पश्तून बहुल है और पाकिस्तान के उत्तर वजीरिस्तान या कुर्रम से सटा हुआ है.
ताकत से तय होता है मालिकाना हक
डूरंड लाइन को अफगानिस्तान ब्रिटिश शासन की देन मानता है. और इसे अस्वीकार करता है. जो कई सौ सालों से बसे पश्तूनों को 2 हिस्सों में बांट देता है. पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार करता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इसे पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा मानता है.
अफगानिस्तान की इस असहमति के कारण कोई संयुक्त मान्यता या संधि नहीं है. यहां नक्शे या कानूनी दावे कमजोर पड़ जाते हैं क्योंकि इलाका पहाड़ी, दुर्गम और कबीलाई बहुल है. जहां स्थानीय जनजातियां, तस्करी और आतंकी ग्रुप्स सक्रिय हैं.
यहां वास्तविक कंट्रोल सैन्य उपस्थिति, चौकियों पर कब्जा, एयर पावर, आर्टिलरी और ग्राउंड फोर्स से तय होता है. हाल की 26-27 फरवरी 2026 की लड़ाइयां और एक दूसरे की पोस्ट कैप्चर करने का दावा ताकत पर आधारित हैं, न कि कानूनी फैसले पर. कल को अगर दूसरा देश ज्यादा ताकतवर हो जाएगा तो वह इन चौकियों पर से कब्जा छीन सकता है. जिसके पास ज्यादा मजबूत फोर्स है वही प्रभावी कंट्रोल रख पाता है.
इसका नतीजा यह है कि बॉर्डर पर “मालिकाना हक” डिप्लोमेसी या मैप्स से नहीं, बल्कि बंदूकों, ड्रोन्स और सैन्य ताकत से तय होता है. यह स्थिति दशकों से चली आ रही है, जहां मजबूत पक्ष ही जमीन पर काबिज रहता है.
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