झारखंड के चतरा जिले के सिमरिया के जंगलों में गिरी एयर एंबुलेंस का मलबे के नीचे सात जिंदगियां खत्म हो गई. जिन घरों में यह खबर पहुंची, वहां भी जिंदगी जैसे थम गई है. यह सिर्फ एक विमान दुर्घटना नहीं थी, यह उन परिवारों की सामूहिक त्रासदी है जिनकी पूरी जिंदगी कर्ज के सहारे खड़ी थी.
इस हादसे में जान गंवाने वाले डॉक्टर विकास कुमार गुप्ता रांची के सदर अस्पताल में तैनात थे. उनके पिता बजरंगी प्रसाद, बिहार के औरंगाबाद जिले के एक साधारण परिवार से हैं. टूटी आवाज में वह बताते हैं कि हमने अपनी सारी जमीन बेच दी थी. कर्ज लिया बस एक ही सपना था मेरा बेटा डॉक्टर बनेगा. डॉ. विकास ने ओडिशा के कटक से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की थी. पढ़ाई आसान नहीं थी. फीस, हॉस्टल, किताबें हर चीज के लिए पैसे जुटाने पड़े. पिता बताते हैं कि कई बार किसी तरह पैसों की व्यवस्था की. आंखों में आंसू लिए वह बताते हैं कि लोग कहते थे इतना कर्ज मत लो, कैसे चुकाओगे? लेकिन मैंने कहा, बेटा पढ़ जाएगा तो सब चुका देगा. डॉ. विकास का सात साल का बेटा है.
होटल में लगी आग, इलाज भी उधार से
इस विमान में सवार गंभीर मरीज संजय कुमार चंदवा कस्बे में छोटा-सा होटल चलाते थे. पिछले सप्ताह होटल में शॉर्ट सर्किट से आग लग गई. आग इतनी तेजी से फैली कि संजय बुरी तरह झुलस गए. उन्हें पहले रांची के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया. इलाज महंगा था. हर दिन हजारों रुपये खर्च हो रहे थे. परिवार ने जो बचत थी, वह खत्म हो गई. फिर रिश्तेदारों से मदद मांगी गई. डॉक्टरों ने सलाह दी कि बेहतर इलाज के लिए उन्हें दिल्ली के बड़े अस्पताल ले जाया जाए. सड़क मार्ग से ले जाना जोखिम भरा था. एयर एंबुलेंस ही विकल्प बचा था.
साढ़े सात से आठ लाख लगे… सब उधार
एयर एंबुलेंस बुक करने के लिए करीब 7.5 से 8 लाख रुपये की जरूरत थी. परिवार बेहद साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से है. इतनी रकम जुटाना असंभव-सा था. संजय के भाई अजय, जो हरियाणा सरकार में कार्यरत हैं, बताते हैं कि हमने रिश्तेदारों से कर्ज लिया. कुछ लोगों ने भरोसे पर पैसे दिए. कुछ ने ब्याज पर. हमें लगा जान बच जाएगी तो सब चुका देंगे. मरीज को एयर एंबुलेंस में बैठाया गया. पत्नी, एक रिश्तेदार और मेडिकल टीम साथ थी. परिवार के अन्य सदस्य घर लौट आए दिल में उम्मीद थी कि दिल्ली पहुंचते ही इलाज शुरू होगा और संजय बच जाएंगे. लेकिन घर पहुंचते ही टीवी चैनलों पर खबर चली कि चतरा के सिमरिया जंगल में एयर एंबुलेंस क्रैश. इस हादसे में 17 वर्षीय ध्रुव कुमार भी था. सिमडेगा का रहने वाला ध्रुव रांची में रहकर पढ़ाई कर रहा था. आगे मोबाइल इंजीनियरिंग में करियर बनाने का सपना था. दिल्ली जाने की तैयारी चल रही थी. परिवार बताता है कि वह अपने माता-पिता का अकेला बेटा था. जब मामा संजय झुलसे, तो ध्रुव ने दिल्ली की तैयारी रोक दी और उनकी सेवा में लग गया. डॉक्टरों ने दिल्ली रेफर किया तो वह भी साथ चल पड़ा.
उड़ान और अचानक बदला मौसम
उड़ान भरने के कुछ देर बाद मौसम खराब होने लगा. सिमरिया के घने जंगलों के ऊपर विमान का संतुलन बिगड़ा और वह करम टॉड़ के पास गिर गया. पायलट, सह-पायलट, मेडिकल टीम, मरीज और परिजन सातों की मौके पर ही मौत हो गई. दुर्गम इलाके में राहत-बचाव दल को चार किलोमीटर पैदल चलकर मलबे तक पहुंचना पड़ा. जंगल में बिखरे टुकड़े सिर्फ तकनीकी हादसे की कहानी नहीं कह रहे थे, वे उन कर्जों की भी गवाही दे रहे थे जिन पर ये सपने टिके थे.
ATC से टूटा संपर्क
प्राप्त जानकारी के अनुसार, विमान ने शाम करीब 7:11 बजे रांची एयरपोर्ट से उड़ान भरी थी, लेकिन खराब मौसम (तेज हवाएं और कम विजिबिलिटी) के कारण रूट डायवर्ट करने की कोशिश में 23 मिनट बाद ही ATC से संपर्क टूट गया. विमान चतरा के दुर्गम जंगल में क्रैश हो गया. हादसा इतना भीषण था कि किसी को बचने का मौका नहीं मिला. हादसे की जानकारी मिलते ही जिला पुलिस प्रशासन और एसएसबी 35वीं बटालियन के जवान तुरंत हरकत में आए. विमान सड़क से लगभग चार किलोमीटर अंदर घने और दुर्गम जंगल में गिरा था, जिससे राहत कार्य में भारी मुश्किलें आईं. जवानों को मलबे से शवों को निकालने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी. रेस्क्यू टीम ने सभी शवों को अपने कंधों पर उठाकर चार किलोमीटर पैदल दूरी तय की और फिर एंबुलेंस के जरिए उन्हें पोस्टमार्टम के लिए भेजा दिया.
—- समाप्त —-

