“अभिषेक की फॉर्म को लेकर जो लोग चिंता कर रहे हैं, उनके लिए मैं चिता करता हूं कि अभिषेक की फॉर्म को लेकर इतने चिंतित क्यों हैं. मतलब आप बोल रहे, अभिषेक की जगह उसको (संजू सैमसन) खिलाऊं. तो मतलब तिलक की जगह खिलाऊं. अच्छा ही चल रहा है. पावरप्ले में 40-50 रन बना ही रहे हैं. वो तो नॉर्मल क्रिकेट है. अब हमने बायलेट्रल में इतना अच्छा खेल लिया है. तो उम्मीदें बढ़ जाती हैं, खुद से भी अच्छा करने की उम्मीद होती है. हमें उम्मीद रहती है कि 240-250 बना दें. विकेट यहां थोड़े से अलग हैं, जो चार मैच खेले उसमें परिस्थितियां मुश्किल रहीं. ऑफ स्पिनर पहले नहीं डाल रहे थे, अब डाल रहे हैं. ऐसे में हमें उसकी तैयारी करनी होगी.”
उपरोक्त बयान सूर्यकुमार यादव ने साउथ अफ्रीका के खिलाफ टी20 वर्ल्ड कप मुकाबले से पहले दिया था. यानी भारतीय कप्तान सूर्यकुमार का आत्मविश्वास चरम पर था. उन्होंने साफ कहा था कि पावरप्ले में आसानी से रन बन रहे हैं, टीम 240-250 का स्कोर सोचकर उतरती है और अभिषेक शर्मा-तिलक वर्मा की फॉर्म को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता की जा रही है. साथ ही कप्तान सूर्या विकेटकीपर बैटर संजू सैमसन को प्लेइंग-11 में शामिल करने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन अब मैच के नतीजे ने सूर्या का यही आत्मविश्वास ‘ओवर कॉन्फिडेंस’ में बदल दिया है.
ग्रुप स्टेज में लगातार चार जीत ने भारतीय टीम को अजेय होने का एहसास जरूर दिलाया, मगर असल परीक्षा सुपर 8 में साउथ के खिलाफ हुई. काली मिट्टी की धीमी पिच पर जहां गेंद रुककर आ रही थी, वहां भी भारतीय बल्लेबाज उसी आक्रामक टेम्पलेट पर अड़े रहे. नतीजा ये हुआ कि 188 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारतीय टीम 111 रनों पर ढेर हो गई.
अभिषेक-तिलक को लेकर बड़ा कॉल लेना होगा!
सूर्यकुमार यादव ने मैच से पहले कहा था कि परिस्थितियां अलग हैं और ऑफ स्पिन का इस्तेमाल बढ़ा है, जिसके लिए तैयार रहना होगा. लेकिन मैदान पर तैयारी कम और आत्मविश्वास ज्यादा दिखा. ईशान किशन तो पहले ओवर में पार्टटाइम ऑफ स्पिनर एडेन मार्करम का ही शिकार बने. वहीं खराब फॉर्म से जूझ रहे तिलक वर्मा ने गैर जिम्मेदाराना शॉट खेलकर अपना विकेट गंवाया, साथ ही एक रिव्यू भी बर्बाद किया. अभिषेक शर्मा इस मैच में तो डक पर आउट नहीं हुए, लेकिन 15 रनों की इनिंग्स के दौरान वो ‘आउट ऑफ टच’ नजर आए.
शुरुआती विकेट गिरने के बाद भी किसी बल्लेबाज ने खेल की रफ्तार बदलने या पारी संभालने की कोशिश नहीं की. ‘हर कीमत पर अटैक’ की रणनीति हर हाल में लागू करने की जिद भारी पड़ गई. विडंबना यह रही कि गेंदबाजी में जसप्रीत बुमराह ने जो मेहनत की थी, उसपर भारतीय बल्लेबाजों ने पानी फेर दिया. 188 रनों का टारगेट मुश्किल जरूर था, लेकिन नामुमकिन नहीं. इसके बावजूद भारतीय बैटिंग यूनिट बिखर गया. टॉप ऑर्डर सस्ते में लौटा, कप्तान खुद 18 रन बनाकर आउट हुए और मिडिल ऑर्डर दबाव में टूट गया.
अक्षर को बाहर रखना कहां तक उचित था?
ओवर कॉन्फिडेंस की झलक टीम चयन में भी दिखी. परिस्थितियों को देखते हुए संतुलन की जरूरत थी, लेकिन आक्रामक मानसिकता को प्राथमिकता दी गई. वॉशिंगटन सुंदर को उप-कप्तान अक्षर पटेल पर तवज्जो दी गई, जो समझ से परे रहा. हद तब हो गई, जब सुंदर को बैटिंग में इन फॉर्म शिवम दुबे से ऊपर भेजा गया. विपक्षी गेंदबाजों ने गति और लेंथ में बदलाव किया, तो भारतीय बल्लेबाजों के पास प्लान बी नजर नहीं आया.
यह हार सिर्फ एक मैच की हार नहीं, बल्कि सोच की हार कही जा रही है. बायलेट्रल सीरीज में सफलता ने टीम इंडिया को यह भरोसा दिलाया कि वही फॉर्मूला बड़े टूर्नामेंट में भी चलेगा, लेकिन टी20 वर्ल्ड कप जैसे मंच पर हालात तेजी से बदलते हैं और हर पिच नई कहानी लिखती है. अब हालात यह हैं कि आईसीसी मेन्स टी20 वर्ल्ड कप 2026 में सेमीफाइनल की राह आसान नहीं रही.
आने वाले मुकाबले ‘करो या मरो’ की तरह हैं. कप्तान का आत्मविश्वास टीम की ताकत है, लेकिन जब वही आत्मविश्वास हालात की समझ पर हावी हो जाए, तो नुकसान तय है. सवाल यह नहीं कि सूर्या में काबिलियत है या नहीं, सवाल यह है कि क्या वह आत्मविश्वास और संतुलन के बीच सही रेखा खींच पाएंगे? बड़े टूर्नामेंट में सिर्फ बड़े बयान नहीं, बल्कि हालात के मुताबिक फैसले जीत दिलाते हैं…
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