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    ‘परेशां वो देख नहीं पाती किसी को…’, ठहाकों, कविताओं और शेरों-शायरी से सजी परितोष त्रिपाठी की महफिल

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    ‘परेशां वो देख नहीं पाती किसी को…’, ठहाकों, कविताओं और शेरों-शायरी से सजी परितोष त्रिपाठी की महफिल


    ‘साहित्य आजतक लखनऊ’ की आज की महफिल में शिरकत की मशहूर कवि, एक्टर, परफॉर्मर परितोष त्रिपाठी ने. उन्होंने अपनी कविताओं और टिप्पणियों से लोगों को गुदगुदाया भी, प्रेम के पुराने दिन भी याद दिलाए और फिर भावुक भी कर दिया. उन्होंने शुरुआत की Gen-Z कविताओं से. ऐसी छोटी-छोटी चुलबुली कविताएं और शायरियां जिन्हें सुनकर लोग खिलखिला उठे. परफॉर्मेंस के अंत में परितोष ने अपनी मशहूर कविता ‘पिता’ पढ़ी, जिसने माहौल को कुछ देर के लिए गंभीर कर दिया और लोगों ने खड़े होकर तालियां बजाईं.      

    परितोष त्रिपाठी ने Gen-Z वर्ग के लिए कविता पढ़ी,

    “परेशां वो देख नहीं पाती किसी को
    खराब हमने भी अपना हाल रखा है
    खर्च करता हूं पर कम नहीं होता
    उसकी यादों का पूरा टकसाल रखा है
    बद्दुआ मैं उसे दे नहीं सकता
    उसने खुदा के नाम पर अपना नाम रखा है
    ना फेंको प्यार के जाल यहां
    हमपे किसी ने इश्क का रुमाल रखा है”

    उन्होंने कहा कि असली प्रेम का दिन 14 फरवरी नहीं बल्कि जन्माष्टमी है क्योंकि प्रेम, मर्यादा के साथ किया जाए तो दुनिया भगवान की तरह पूजती है. हमारे लिए प्रेम का प्रतीक ताजमहल नहीं है, हमारे लिए प्रेम का प्रतीक अयोध्या है जहां पिता की आज्ञा से एक बेटा वनवास चला जाता है. पत्नी साथ देने आ जाती है. एक भाई साथ चला जाता है बिना किसी सवाल के. एक भाई 14 वर्षों तक सिंहासन पर नहीं बैठता. ये है प्रेम. क्योंकि प्रेम की एक ही शर्त है, त्याग, बलिदान. यही प्रेम है.

    परितोष ने प्रेम पर शेर पढ़ा,
     
    “फैलते काजल की फिक्र है 
    आंखें फिर से सुनामी नहीं होंगी
    नजर उठाकर देखूंगा नहीं गैर को 
    फिर इश्क की निलामी नहीं होगी
    दोनों सीख गए हैं झूठ बोलना
    अब किसी में कोई खामी नहीं होगी
    उसकी बहती आंखों को चूमा है
    इश्क में नमकहरामी नहीं होगी”

    ‘लड़कियां’ और ‘मजदूर’ जैसी उनकी कुछ पॉपुलर कविताओं ने माहौल को कुछ देर के लिए गंभीर बना दिया. 

    “क्या इसी दिन के लिए वो सड़कें बनाता है, 
    जो हर मुसीबत पर सड़क पर आ जाता है”

    आखिर में उन्होंने अपनी वायरल कविता ‘पिता’ पढ़ी और अपने पिता से जुड़ा एक किस्सा भी सुनाया जिसे सुनकर लोग खड़े होकर तालियां बजाने लगे.

    “जो बिना आंसू, बिना आवाज के रोता है, वह बाप होता है
    जो बच्चों की किस्मत के छेद अपनी बनियान में पहन लेता है, वह बाप होता है
    घर में जब सबके नए जूते आते हैं, बाप के तलवे घिस जाते हैं
    जो अपनी आंखों में दूसरों के सपने संजोता है वो बाप होता है
    बाप रखवाला होता है, बाप निवाला होता है
    बाप अपनी औलाद से हारकर मुस्कुराने वाला होता है
    बाप करता है कहता नहीं
    जब बाप समझ में आए तब तक वो पास रहता नहीं” 

    —- समाप्त —-



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