मसाले हर बार वही होते हैं- बड़ी इलायची, जायफल, दालचीनी वगैरह वगैरह. लेकिन इस्तेमाल करने वाले हाथों के साथ जैसे इनका जायका बदलता जाता है. खून-खच्चर भरा एक्शन ड्रामा, बेहतरीन गाने और लव स्टोरीज इन दिनों बॉलीवुड के सबसे पॉपुलर मसाले हैं. लेकिन विशाल भारद्वाज जैसे आला दर्जे के सिनेमाई शेफ के हाथों में आकर ये मसाले एक अलग जायका देने लगेंगे इस उम्मीद में ‘ओ रोमियो’ चखने का फैसला किया गया. विशाल की ये डिश हाफ प्लेट निपटाई जा चुकी है और अभी तक तो ये काफी जायकेदार है.
फ़िल्ममेकिंग के बेहतरीन जायके से भरा फर्स्ट हाफ
शाहिद कपूर को करियर का सबसे धमाकेदार इंट्रो मिलने के साथ ही ‘ओ रोमियो’ शुरू हो जाती है. शाहिद उस्तरे से हत्याएं करने वाले खूंखार गैंगस्टर उस्तरा के रोल में हैं. उनके उस्तरे में इतनी धार है कि वो शरीर से काट के आत्मा को अलग कर देता है. अपनी मर्जी से कदम थिरकाने वाले इस गैंगस्टर को सिर्फ एक ही मास्टर अपनी धुन पर नचा सकता है- खान साहब (नाना पाटेकर). खान साहब आईबी के कॉप हैं और उस्तरा की धार को क्राइम निपटाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.
उस्तरा की लाइफ में अनसुने राग उस दिन बजने लगते हैं जब एंट्री होती है अफशां (तृप्ति डिमरी) की. अफशां सुपारी देने आई है, उस्तरा के साथी रहे खूंखार गैंगस्टर जलाल (अविनाश तिवारी) और उसके तीन साथियों की. अफशां की सुपारी के पीछे मकसद है बदला. कैसा बदला, किस बात का बदला, ये सब आप फ़िल्म में ही देखें तो ज़ायका बना रहेगा.
विशाल की उम्दा फ़िल्ममेकिंग पर 90s के गानों की गार्निश के साथ ‘ओ रोमियो’ का फर्स्ट हाफ काफी पैक है. कहानी को डेवलप होने, टेंशन को सीन्स में घुलने और इश्क के लफड़ा-ए-अंजाम को सेटल होने का पूरा वक्त मिलता है. जहां पेस फ़ास्ट होनी चाहिए, फ़ास्ट है. जहां स्वाद लेने के लिए थोड़ा ठहराव मिलना चाहिए, वहां ठहराव है.
सभी एक्टर्स का काम जानदार लगता है. इंटरवल से ठीक पहले कहानी के मेन विलेन जलाल यानी अविनाश तिवारी की तगड़ी एंट्री हुई है. और कहते हैं कि विलेन की एंट्री से ही पिच्चर शुरू होती है. अब देखना है आगे क्या होता है.
—- समाप्त —-


