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    फ्री का माल दिखा तो उठा लो..! सरकारी सामान पर क्यों डोल जाता है ईमान?

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    फ्री का माल दिखा तो उठा लो..! सरकारी सामान पर क्यों डोल जाता है ईमान?


    सबने ये कहावत तो सुनी होगी – माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम. मुफ्त का माल मिल जाए तो दिल बेरहम हो जाता है. लेकिन लखनऊ से ऐसा मामला सामने आया, जहां माल मुफ्त का नहीं था, लेकिन दिल बेरहम हो गया. क्योंकि माल सरकारी था. और उन्हें लगा कि उन्हें देखने वाला कोई नहीं. लेकिन, चिंता का विषय वो कुछ लोग नहीं हैं. 

    लखनऊ में उद्घाटन राष्ट्र प्रेरणा स्थल का हुआ. लेकिन, उद्घाटन के बाद, अंधेरा हुआ तो लखनऊ की सुंदरता को चिंदी चोरी छीनने लगी. राष्ट्र प्रेरणा स्थल के बाहर लगाए गए सरकारी गमलों की चोरी के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने पर आजतक वहां सच्चाई जानने पहुंचा था.

    गमलों की चोरी ये सोचकर हो रही थी कि कहीं कैमरे देख न लें. कोई मोटरसाइकिल पर था. कोई-कोई पार्टी का झंडा भी थामे हुआ था. कोई पैदल ही गमलों को नोंचे ले रहा था. ये वीडियो जब लखनऊ नगर निगम और विकास प्राधिकरण तक पहुंचे तो उन्हें गमलों को फौरन से हटाना पड़ा.

    वायरल वीडियो से ऐसा प्रतीत होता है कि इनमें से ऐसा कोई होगा जिनका कोई आपराधिक इतिहास हो. इस मायने में ये लोग समाज के तथाकथित सभ्य लोग हैं. लेकिन, क्या हो जाता है, आखिर ये सोच कैसी है कि बस सरकारी माल है तो उड़ा लो? पहली बार ऐसा लखनऊ में ही हुआ हो, ऐसा नहीं है.

    महंगी गाड़ी से गमला चुराने वाली तस्वीर दो साल साल गुरुग्राम से आई थी. गुरुग्राम की तस्वीर फरवरी-मार्च 2023 में खूब चर्चा में आई थी. जो गमले चुराए गए वो G20 आयोजन के लिए सुंदरता के लिए लगाए गए थे.

    अक्टूबर 2023 में भी G20 आयोजन के कुछ हफ्तों बाद दिल्ली में भारत मंडपम और प्रगति मैदान के बाहर रखे गमले गायब होने की रिपोर्ट्स आई थीं.

    अगस्त 2025 की मीडिया रिपोर्ट्स में गाजियाबाद में नालों को ढकने के लिए रखे गए लोहे के नाली की जाली चुराते दो लोगों की तस्वीरें वायरल हुई थीं.

    मुंबई महानगर पालिका BMC के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में जनवरी से जून के बीच 220 मैनहोल कवर चुरा लिए गए. 2024 में NHAI ने राष्ट्रीय राजमार्ग-7 पर जो स्ट्रीटलाइट्स लगवाईं, उनमें से करीब 40 खंबों में से बिजली के तार काट लिए गए. 2023 की न्यूज रिपोर्ट्स के मुताबिक बिहार के समस्तीपुर में 2 किलोमीटर लंबा रेलवे ट्रैक चुरा लिया गया. उसी साल पटना के सब्जीबाग में 29 फीट लंबा मोबाइल टावर उखाड़ ले जाने की रिपोर्ट दर्ज हुई. 2022 में बिहार के रोहतास में 60 फीट लोहे का पुल काट ले जाने की खबरें आई थीं. 2017-18 की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक रेलवे के AC डिब्बों में से 21 लाख तौलिये, बेड शीट, कंबल और अन्य सरकारी सामान गायब हुए. इनकी कीमत 14 करोड़ रुपये थी.

    ये मैंने सिर्फ चंद उदाहरण हैं. ऐसे एक नहीं अनेक मामले हैं. और ऐसे मामले देश के किसी एक कोने या किन्हीं खास जगहों की बीमारी नहीं. ये समाज के कु-संस्कार का वो सच है, जो भारत को परेशान करने वाला तथ्य है.

    यह भी पढ़ें: गमले ही नहीं होर्डिंग-पुतले भी लेकर भागे लोग, लखनऊ में मची अनोखी लूट का नया Video

    अगर भारत को एक गोदाम मानें तो क्या ऐसी चोरियां उस गोदाम में चूहे की सेंध सरीखी नहीं? भारत दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है. ऐसे में क्या सरकारी माल को अपना माल समझने की ये फितरत भारत की ग्रोथ स्टोरी में स्पीड ब्रेकर नहीं है?

    ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स यानी CPI में 2024 की रैंकिंग में भारत 96वें पायदान पर था. 2024 की CPI रैंकिंग है. नंबर 1 डेनमार्क, नंबर 2 फिनलैंड, नंबर 3 सिंगापुर, नंबर 4 न्यूजीलैंड, और नंबर 5 पर लग्जमबर्ग, नॉर्वे और स्विटजरलैंड. बात सिर्फ ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के रैंकिंग की नहीं है.

    दिसंबर 2024 में प्रकाशित LocalCircles के सर्वे में भारत के 159 जिलों में लगभग 66 फीसदी व्यापारिक कंपनियों ने कहा कि उन्होंने पिछले 12 महीनों में रिश्वत दी. 54 फीसदी ने कहा कि उन्हें रिश्वत देने के लिए मजबूर किया गया सर्वेक्षण में शामिल केवल 16 फीसदी व्यवसायिक प्रतिष्ठानों ने दावा किया कि वे हमेशा रिश्वत दिए बिना काम करवाने में कामयाब रहे हैं 19 फीसदी ने कहा कि उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता नहीं पड़ी.

    किसी का छोटा भ्रष्टाचार राष्ट्र का बड़ा नुकसान करता है. और हद तो इस बात की है कि हमारे दिनचर्या में व्याप्त ऐसी कई आदतें हैं, जिन्हें हम चोरी या भ्रष्टाचार मानने को तैयार नहीं होते. मनी लॉन्ड्रिंग, गबन, उगाही जैसे अपराधों की तो साफ सजा है, लेकिन सच्चाई ये है कि भाई-भतीजा वाद, पद का दुरुपयोग, किसी के पहचान की चोरी, पक्षपात जैसे मामले भी ये भी चोरियां हैं. काश! हम ये बात सोच और समझ पाते.

    अकबर इलाहाबादी का मशहूर शेर है – दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीदार नहीं हूं. अकबर इलाहाबादी साहब से देशवासी यही कहना चाहेगा, कि दुनिया का तलबगार होने में भी बुराई नहीं, खरीदार होने में भी बुराई नहीं, लेकिन सरकारी माल दबाना जरूर बुरा है.

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