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    दिल्ली-NCR में इस बार पॉल्यूशन का ‘टॉक्सिक कॉकटेल’, इन 5 नए खतरों की आहट

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    दिल्ली-NCR में इस बार पॉल्यूशन का ‘टॉक्सिक कॉकटेल’, इन 5 नए खतरों की आहट


    इस साल अक्टूबर से शुरू हुआ दिल्ली-NCR का प्रदूषण अब दिसंबर तक लंबा खिंच गया है. हवा की गुणवत्ता लगातार बहुत खराब से गंभीर बनी रही, जबकि पराली जलाने का योगदान बहुत कम रहा. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की नई रिपोर्ट ‘टॉक्सिक कॉकटेल ऑफ पॉल्यूशन ड्यूरिंग अर्ली विंटर इन दिल्ली-एनसीआर’ में बताया गया है कि लोकल स्रोतों से निकलने वाला प्रदूषण अब मुख्य विलेन बन गया है.

    रिपोर्ट के मुताबिक, PM2.5 के साथ-साथ नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) के स्तर भी बढ़े हैं, जो एक जहरीला मिश्रण बना रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे-छोटे कदम अब काम नहीं आएंगे, बल्कि वाहनों, उद्योगों और बिजली संयंत्रों से उत्सर्जन कम करने के लिए बड़े बदलाव जरूरी हैं.

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    रिपोर्ट में अक्टूबर-नवंबर (15 नवंबर तक) के ट्रेंड्स का विश्लेषण किया गया है, जो सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के डेटा पर आधारित है. इसमें 5 नए खतरे सामने आए हैं, जो वैज्ञानिक तथ्यों के साथ समझाए गए हैं. 

    खतरा 1: प्रदूषण का मौसम लंबा और बेकाबू हो गया

    इस बार प्रदूषण अक्टूबर से दिसंबर तक 80 दिनों से ज्यादा चला, जबकि पहले नवंबर तक ही सीमित रहता था. AQI लगभग पूरे नवंबर में बहुत खराब से गंभीर रहा.

    • वैज्ञानिक तथ्य: PM2.5 औसत स्तर पिछले साल से 9% कम रहा, लेकिन तीन साल के औसत से कोई बदलाव नहीं – 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (µg/m³) के आसपास स्थिर. पीक स्तर थोड़े कम हुए, लेकिन दैनिक औसत खतरनाक बने रहे हैं.
    • कारण: सर्दियों में हवा की सीमा परत (बाउंड्री लेयर) उथली हो जाती है, जिससे प्रदूषण वाले तत्व फंस जाते हैं. वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन सुबह (7-10 बजे) और शाम (6-9 बजे) में बढ़ते हैं, जो PM2.5 को तेजी से बढ़ाते हैं.

    CSE की अनुमिता रॉयचौधरी कहती हैं कि यह ट्रेंड दिखाता है कि मौसम पर निर्भरता कम होनी चाहिए, लोकल स्रोतों पर नियंत्रण जरूरी है.

    खतरा 2: हॉटस्पॉट्स की संख्या बढ़ी, नए इलाके प्रभावित

    2018 में सिर्फ 13 हॉटस्पॉट थे, अब कई नए जुड़ गए हैं. जहांगीरपुरी में PM2.5 का सालाना औसत 119 µg/m³ रहा, उसके बाद बवाना और वजीरपुर 113 µg/m³ पर. नए हॉटस्पॉट जैसे विवेक विहार (101 µg/m³), नेहरू नगर, अलीपुर, सीरीफोर्ट, द्वारका सेक्टर-8 और पटपड़गंज 90 µg/m³ से ऊपर.

    • वैज्ञानिक तथ्य: ये इलाके न सिर्फ स्टैंडर्ड से ऊपर हैं, बल्कि शहर के औसत से भी ज्यादा प्रदूषित हैं. उत्तर और पूर्वी दिल्ली सबसे प्रभावित.
    • कारण: ट्रैफिक, उद्योग, कंस्ट्रक्शन और कचरा जलाने से धूल और गैसें बढ़ रही हैं. रिपोर्ट कहती है कि ये हॉटस्पॉट अब स्थाई हो गए हैं, चार साल से लगातार बने हुए.

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    खतरा 3: पराली अब मुख्य विलेन नहीं, लोकल स्रोत 85% प्रदूषण पैदा कर रहे

    पंजाब-हरियाणा में बाढ़ के कारण पराली जलाने की घटनाएं बहुत कम रहीं. अक्टूबर-नवंबर में ज्यादातर दिनों में इसका योगदान 5% से नीचे रहा, कुछ दिनों में 5-15% और 12-13 नवंबर को पीक पर 22%.

    • वैज्ञानिक तथ्य: PM2.5 ने 34 दिनों में AQI को प्रभावित किया, PM10 ने 25 दिनों में, ओजोन ने 13 दिनों में. फिर भी हवा साफ नहीं हुई, मतलब लोकल स्रोत जिम्मेदार.
    • कारण: वाहन (डीजल से NO2 और CO), उद्योग, बिजली संयंत्र, कचरा जलाना और घरेलू ईंधन. CSE की रिपोर्ट कहती हैं कि पराली कम होने से पीक स्पाइक्स रुके, लेकिन औसत स्तर वही खतरनाक बने रहे.

    Delhi NCR Pollution

    खतरा 4: PM2.5 के साथ NO2 और CO का जहरीला मिश्रण – अनदेखा खतरा

    सभी की नजर PM2.5 पर है, लेकिन NO2 और CO के स्तर भी बढ़े, जो एक टॉक्सिक कॉकटेल बना रहे हैं.

    • वैज्ञानिक तथ्य: NO2 और PM2.5 सुबह-शाम एक साथ बढ़ते हैं, क्योंकि ट्रैफिक से निकलते हैं. CO ने 22 स्टेशनों पर 30 से ज्यादा दिनों में 8-घंटे स्टैंडर्ड (2 mg/m³) तोड़ा. द्वारका सेक्टर-8 में 55 दिन, जहांगीरपुरी और नॉर्थ कैंपस में 50-50 दिन रहा.  
    • कारण: वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन, जो सर्दियों में फंस जाता है. यह मिश्रण फेफड़ों, खून और दिल को नुकसान पहुंचाता है. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यह कॉकटेल सांस लेना और भी जहरीला बना रहा है.

    खतरा 5: छोटे शहरों में स्मॉग ज्यादा तीव्र और लंबा, पूरा इलाका एक एयरशेड

    एनसीआर के छोटे शहर जैसे बहादुरगढ़, पानीपत, रोहतक अब दिल्ली जितने या ज्यादा प्रदूषित हो रहे हैं. 9-18 नवंबर तक बहादुरगढ़ में 10 दिनों तक स्मॉग रहा.

    • वैज्ञानिक तथ्य: पूरा क्षेत्र अब एक एयरशेड की तरह व्यवहार कर रहा है, जहां प्रदूषण फैलता है. छोटे शहरों में स्मॉग एपिसोड ज्यादा देखने को मिल रहे हैं.
    • कारण: दिल्ली का प्रदूषण हवा के साथ फैल रहा है, प्लस लोकल ट्रैफिक और उद्योग. लंबे समय का ट्रेंड देखें तो 2022 से PM2.5 स्थिर, 2024 में सालाना औसत 104.7 µg/m³ – कोई सुधार नहीं.

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    समाधान: छोटे कदम नहीं, बड़े बदलाव जरूरी

    CSE की रिपोर्ट कहती है कि प्रदूषण ऊंचे स्तर पर स्थिर हो गया है, अब ‘लीपफ्रॉग स्ट्रैटेजी’ अपनानी होगी. यह इन्फ्लेक्शन पॉइंट है – या तो उत्सर्जन काटो, वरना ट्रेंड ऊपर चढ़ेगा. 

    • GRAP नियमों को सख्ती से लागू करें, खासकर वाहनों और धूल पर.  
    • CO और NO2 मॉनिटरिंग बढ़ाएं. 

    लंबे समय के समाधान  

    • वाहन: सभी वाहनों का समयबद्ध इलेक्ट्रिक, पुरानी गाड़ियां स्क्रैप करें. सार्वजनिक परिवहन बढ़ाएं, साइकिलिंग-वॉकिंग को प्रोत्साहन. पार्किंग कैप, कंजेशन टैक्स लगाएं.  
    • उद्योग: सस्ते साफ ईंधन (नेचुरल गैस) पर शिफ्ट, टैक्स कम करें. प्रक्रियाओं को इलेक्ट्रिक बनाएं, उत्सर्जन नियंत्रण सख्त.  
    • कचरा: जलाना बंद करें – अलग-अलग करें, पुराना कचरा सुधारें, रिसाइक्लिंग बढ़ाएं.   
    • बिजली संयंत्र: उत्सर्जन स्टैंडर्ड पूरे करें.  
    • कंस्ट्रक्शन: कचरा रिसाइकल, धूल नियंत्रण, साल भर स्मार्ट मॉनिटरिंग.  
    • घरेलू: खाना-पकाने और गर्म करने के लिए साफ ईंधन दें.  
    • पराली: मिट्टी में मिलाएं या बायो-मिथेनेशन से इथेनॉल-गैस बनाएं, किसानों की आय बढ़े.

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