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    वही विनाश काल है, वही जनक… साहित्य आजतक में आलोक श्रीवास्तव की शिव स्तुति पर झूमे दर्शक

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    वही विनाश काल है, वही जनक… साहित्य आजतक में आलोक श्रीवास्तव की शिव स्तुति पर झूमे दर्शक


    Sahitya Aajtak 2025: राजधानी दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में आजतक का साहित्य महोत्सव चल रहा है. ‘साहित्य आजतक’ के तीसरे और आखिरी दिन सत्र ‘आलोकनामा’ में प्रख्यात लेखक आलोक श्रीवास्तव ने अपनी कविताओं से दर्शकों का खूब मनोरंजन किया. दर्शकों ने उनकी कविताओं का खूब लुत्फ उठाया और तालियां बजाईं. 

    आलोक श्रीवास्तव ने सत्र की शुरुआत में अपनी गजल सुनाते हुए कहा- 

    सुकून-ए-दिल के लिए कुछ तो एहतमाम करूं
    और जरा नजर जो मिले फिर उन्हें सलाम करूं,
    मुझे तो होश नहीं आप मशवरा दीजिए 
    कहां से छेड़ूं फंसाना कहां तमाम करूं.

    ये सोचना गलत है कि…

    उन्होंने शान का गाया अपनी कविता भी सुनाई जो इस प्रकार है-

    ये सोचना गलत है के तुम पर नजर नहीं,
    मसरूफ हम बहुत हैं मगर, बेखबर नहीं.

    हम आपके इशारे पर घर-बार छोड़ दें
    दीवाने हैं जरूर मगर इस कदर नहीं.

    आ ही गए हैं ख्वाब तो फिर जाएंगे कहां
    आंखों से आगे इनकी कोई रहगुजर नहीं.

    कितना जिएं, कहां से जिएं और किसलिए
    ये इख्तियार हमपर है, तकदीर पर नहीं.

    सत्र के दौरान आलोक श्रीवास्तव ने कहा कि एक असफल व्यक्ति किसी को अच्छा नहीं लगता लेकिन जब वो सफल हो जाता है तो हर कोई उससे संबंध बनाना चाहता है. उन्होंने इसी पर आधारित एक कविता सुनाई जो इस प्रकार है-

    जब भी तकदीर का हल्का सा इशारा होगा
    आसमां पर कहीं मेरा भी सितारा होगा,

    दुश्मनी नींद से करके मैं बहुत डरता हूं
    अब कहां पर मेरे ख्वाबों का गुजारा होगा,

    मुंतजिर जिसके लिए हम हैं कई सदियों से
    जाने किस दौर में वो शख्स हमारा होगा.

    शिव स्तुति सुन झूमे दर्शक

    सत्र के अंत में आलोक श्रीवास्तव ने अपनी प्रसिद्ध शिव स्तुति सुनाई जिसे सुन दर्शक झूम उठे. उनकी शिव स्तुति इस प्रकार है-

    जटाओं से है जिनके जलप्रवाह माते गंग का
    गले में जिनके सज रहा है हार विष भुजंग का
    डमड्ड डमड्ड डमड्ड डमरु कह रहा शिवः शिवम्
    तरल-अनल-गगन-पवन धरा-धरा शिव: शिवम् 

    जो नंन्दनी के वंदनीय, नंन्दनी स्वरूप है
    वे तीन लोक के पिता, स्वरूप एक रूप है
    कृपालु ऐसे है के चित्त जप रहा शिवः शिवम्
    तरल-अनल-गगन-पवन धरा-धरा शिव: शिवम्

    सदैव सर्व मंगला,कला के शीर्ष देवता
    वही विनाश काल है, वही जनक जनन सदा
    नमन कृतज्ञ प्राण यह जपे सदा शिवः शिवम् 
    तरल-अनल-गगन-पवन धरा-धरा शिव: शिवम्

    —- समाप्त —-



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