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    साहित्य आजतक के मंच पर कविताओं का शौर्य… दुश्मन पर बारूद बनकर बरसे शब्द

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    साहित्य आजतक के मंच पर कविताओं का शौर्य… दुश्मन पर बारूद बनकर बरसे शब्द


    राजधानी दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में साहित्य आजतक की सालाना बैठकी का आगाज हो चुका है. पहला दिन कुछ बहुत ही खूबसूरत और यादगार सेशन व लम्हों के नाम रहा. इसकी शुरुआत एक ओर जहां कवि कुमार विश्वास के सत्र अपने-अपने राम से हुई तो वहीं अस्ताचलगामी सूर्यदेव की आभा से जो आकाश सिंदूरी हो चला था, उसका कुछ रंग साहित्य के इस महाकुंभ में बिखर गया.

    यह सिंदूरी रंगत शृंगार की नहीं थी, यह शौर्य की आंच थी, जिसे वीर रस की ज्वलंत कविताओं ने ईंधन बनकर और दहकाया. नतीजा ये हुआ कि दस्तक दरबार का वह मंच जो वीर रस की कविताओं में पगा हुआ था, वहां समवेत स्वर में ‘भारत माता की जय और वंदे मातरम्’ का नाद गूंज उठा. 

    साहित्य आजतक 2025 के पहले दिन की शाम दस्तक दरबार का मंच अदम्य जज़्बे, अटूट साहस और अटल राष्ट्रभक्ति से सराबोर रहा. मंच पर ‘ऑपरेशन सिंदूर – वीर रस कवि सम्मेलन’ के दौरान देश के जाने-माने वीर रस के कवियों ने अपने शब्दों से ऐसा जोश जगाया कि पूरा सभागार बार-बार गगनभेदी तालियों से गूंजता रहा. इस सत्र ने न सिर्फ सैनिकों के त्याग और पराक्रम को सलामी दी, बल्कि उस राष्ट्रभाव को भी श्रद्धा से याद किया, जो हर भारतीय के रक्त में धड़कता है.

    इस सत्र में कर्नल वीपी सिंह, कमांडर समोद सिंह, मदन मोहन समर, कविता तिवारी, विनीत चौहान और मनीष मधुकर ने अपनी कविताओं की लौ से भारत मां की दिव्य आरती उतारी और सैनिकों के अदम्य साहस को प्रणाम किया.

    हम झुककर बात करने वाले लोग नहीं- कर्नल वीपी सिंह

    कर्नल वीपी सिंह ने माइक संभालते ही अपने अंदाज से यह जता दिया कि मंच पर जो आया है वह सिर्फ कवि नहीं भारत मां की सीमा का एक प्रहरी भी है. उन्होंने माइक को अपने कद के बराबर उठाया और बोले कि ‘हमें झुककर बात करने की आदत नहीं है.’ जांबाज़ कर्नल वीपी सिंह के शब्दों में सच्चे सैनिक का तेवर था और देश का दर्द भी. उन्होंने कहा कि शहीदों को समाज कुछ दिनों तक याद कर भले ही चुप हो जाए, पर सैनिकों के भीतर का उफान कभी शांत नहीं होता.

    उनकी पंक्तियां

    रक्त में उफान था बस चार दिन
    हरकहीं तूफान था बस चार दिन
    भूल सारे भेद सारे फासले साथ 
    हिंदु्स्तान था बस चार दिन
    टोलियों से भरी राहें चार दिन
    कहीं आंसू कहीं आहें चार दिन
    थामने को बढ़ी बाहें चार दिन
    सरहदों पर थीं निगाहें चार दिन

    चार दिन में सब बेमानी हो गया
    चार दिन में खून पानी हो गया
    मिट गया जो सरहदों की शान में 
    चार दिन में वो कहानी हो गया

    युद्ध अगर है समाधान तो और नहीं टालेंगे हम
    अपने संकल्पों को तपते लोहे में ढालेंगे हम
    चिह्नित कर आतंकी अड्डे हम ब्रह्मोस चलाएंगे
    सिंदूर मिटाने वालों का अस्तित्व मिटा डालेंगे हम…

    उनकी इन पंक्तियों पर श्रोता जोश से भर उठे. कर्नल सिंह ने आतंकवाद और पाकिस्तान की हरकतों पर सीधी चोट की और कहा कि अगर किसी के लिए आतंक उसका धर्म है तो उसे दंडित करना हमारा धर्म है. 

    कमांडर समोद सिंह ने दिया सीमा के स्वाभिमान का परिचय

    कमांडर समोद सिंह ने “ऑपरेशन सिंदूर” का उल्लेख करते हुए अपनी कविता में बताया कि कैसे इस अभियान में सैनिकों ने दुश्मनों के बंकर ध्वस्त किए. उनकी कविता में एक सैनिक की तपस्वी जीवनशैली, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का विराट स्वरूप दिखाई दिया.

    सीमाओं पर दुश्मनों के बंकरों को ध्वस्त किया
    न्याय का नया स्वरूप दे दिया सिंदूर ने
    पानी वाली नदियों का रुख मोड़ने के बाद
    रनवे के बीच कूप दे दिया सिंदूर ने

    व्योम वाली व्योमिका के साथ सोफिया को देख
    बेटियों को सिंह रूप दे दिया सिंदूर ने,
    गोली के जवाब में जो गोला दाग दे तुरंत
    भारत को ऐसा भूप दे दिया सिंदूर ने।

    उनकी पंक्तियों ने ऑपरेशन सिंदूर की महिमा और इसके प्रभाव को बड़ी ही खूबसूरती से सामने रखा. 

    कवि मदन मोहन समर: पहले माटी देश की…

    मदन मोहन समर ने भारतीय परंपरा की आत्मा को शब्दों में पिरोया. उन्होंने देश की एकता और अखंडता को दो पंक्तियों में सामने रखा-
    अपनी निष्ठा एक है अपना एक विधान
    पहले माटी देश की, फिर अल्लाह भगवान

    इसके जरिए उन्होंने मंच पर धार्मिक समन्वय और राष्ट्र–सर्वोपरि भावना को रेखांकित किया.

    फिर इसके बाद जब उन्होंने ज्वलंत कविता पाठ शुरू किया तो श्रोता रुके नहीं. तालियां बजती रहीं.

    है विजयी पृष्ठ पर अंकित जो सिंदूर हमारा याद हमें
    है धमनी और शिराओं का संवाद हमारा याद हमें

    वह समर समर क्या महासमर था, उत्सव था शिव के नर्तन का
    सदियों से शांत कपोतों की भाषा के युग परिवर्तन का

    वह युद्ध बुद्ध पर हमला था, हमला था कृष्ण कन्हाई पर,
    अरिहंत वाद पर हमला था,  हमला था पीर पराई पर।
    वसुधैव कुटुंबकम पर गूंथे हर तानेबाने पर हमला था,
    नानक के खेतों पर चुगती चिड़ियों के दाने पर हमला था।

    Sahitya Aajtak

    कविता तिवारी-  काव्य में दहकती देशभक्ति की ज्वाला

    अपने तेजस्वी स्वर और प्रखर देशभक्ति के लिए चर्चित कवियत्री कविता तिवारी ने मंच पर वीरांगना का उत्साह भर दिया. जब वह मंच पर आईं तो कविता पाठ शुरू किया तो उनके सुर किसी सिंहनी के नाद से लग रहे थे. उन्होंने देश के जवानों को प्रणाम किया, भारत मां को नमन किया और फिर वीरता का ऐसा राग छेड़ा के सुनने वाले दंग रह गए.

    उनकी पंक्तियां देखिए…
    भारती की आरती उतारने को आतुर हों,
    शौर्य की उपासक जवानी की कसम है
    शत्रु मुंड माल धार असि में प्रकट हुईं
    मातु काली दुर्गा भवानी की कसम है
    वीर बलिदानियों ने पावन धरा पर
    रक्त रक्त से लिखी कहानी की कसम है
    अमर तिरंगा कभी झुकने न देना तुम्हें—
    सिंधु वाले पानी की रवानी की कसम है.

    पर युवा दर्शक रोमांचित हो उठे. उनका काव्य सैनिकों की आत्मा, मातृभूमि की शक्ति और स्त्री–शौर्य का जीवंत चित्र था.

    विनीत चौहान- कविता के जरिए भीतर के गद्दारों पर बोला हमला

    विनीत चौहान की कविता में जज़्बा ही नहीं, बल्कि कड़वे सच भी थे. उन्होंने सुरक्षा चूक, राजनीतिक भूलों और आतंक पर सख्त प्रहार किया, उन्होंने हाल ही में आतंकी घटनाओं में लिप्त और संदेह व जांच के घेरे में आए डॉक्टरों पर भी तंज कसा-

    आपको तो घाव पर मरहम लगाना चाहिए था
    आपको तो जहर को अमृत बनाना चाहिए था
    जिंदगी देनी थी तुमको मौत बांटी है मगर
    चुल्लू भर पानी में तुमको डूब जाना चाहिए था.

    उन्होंने आतंक के घुसपैठ की समस्या पर सवाल उठाए- 

    आतंकी कैसे घुस आए लाहौरी दरबारों से?
    लगता है कुछ चूक हुई है अपने पहरेदारों से
    वरना खून नहीं बहता भारत मां के लालों का
    गर पहले उत्तर दे देते पहले के भूचालों का
    तुम मौन रहे खामोश रहे काटों की पौध लगा बैठे,
    शांति शांति के चक्कर में आधा कश्मीर गंवा बैठे।

    उनकी पंक्तियां चेतावनी भी थीं और संकल्प भी कि देश को छले हुए इतिहास को अब दोहराने नहीं दिया जाएगा.

    मनीष मधुकर: परचम, पराक्रम और पहरेदारों का धर्म

    सत्र में इसके बाद आए कवि मनीष मधुकर, उन्होंने अपने विशिष्ट शैली में भारत का उजाला और सैनिक का जीवन दोनों चित्रित किए और वर्दी की अहमियत भी बताई.

    उनकी पंक्तियां-
    तुम्हारे नाम से ज्यादा कोई मंसूब क्या होगा
    वतन के काम आ जाए तो इससे खूब क्या होगा
    जवानी दिल हथेली पर लिए कहती फिरे है के
    वतन से बढ़कर दुनिया में भला महबूब क्या होगा.

    ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का यह वीर रस कवि सम्मेलन केवल कविता नहीं था, यह उन भावनाओं का प्रवाह था जिनसे यह देश बना है. यह सत्र सैनिकों के साहस का उत्सव था, उनके बलिदान की गाथा था, और हम सबके भीतर छिपे उस भारतीय के लिए उठी हुई पुकार था, जो इस देश की सीमा के भीतर खुद को सुरक्षित महसूस करता है. 

    साहित्य आजतक के पहले दिन मंच पर वीर रस की यह दहाड़ साबित कर गई कि शब्द सिर्फ कविता नहीं होते, वे समय के इतिहास और राष्ट्र की धड़कन बन जाते हैं.

    —- समाप्त —-



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