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    अक्षय नवमी आज… जानिए कार्तिक में क्यों करनी चाहिए आंवले की पूजा

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    अक्षय नवमी आज… जानिए कार्तिक में क्यों करनी चाहिए आंवले की पूजा


    सनातन परंपरा में कार्तिक मास को बहुत पवित्र और पुण्यदायक माना गया है. इस मास की शुक्ल नवमी तिथि, जिसे अक्षय नवमी कहा जाता है, विशेष रूप से भगवान विष्णु को प्रिय है. इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का विधान है. शास्त्रों खासतौर पर स्कंदपुराण में कहा गया है,’जो व्यक्ति आंवले का स्मरण भी करता है, उसे गोदान के समान फल प्राप्त करता है’ उसके दर्शन से दुगुना और फल खाने से तिगुना पुण्य मिलता है.’

    कल्याणकारी माना गया है आंवले के फल का सेवन
    इसलिए आंवले के फल का सेवन और पूजन हर व्यक्ति के लिए कल्याणकारी माना गया है. यह वृक्ष भगवान विष्णु को अति प्रिय है और पापों का नाश करने वाला भी. जो व्यक्ति आंवले के वृक्ष की पूजा करता है, उसे समस्त कामनाओं की सिद्धि प्राप्त होती है. पुराणों में वर्णित है कि जो मनुष्य कार्तिक मास में आंवले के वन में भगवान श्रीहरि की पूजा करता है और उसकी छाया में बैठकर भोजन करता है, उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है. आंवले की छाया में किया गया हर शुभ कार्य करोड़गुना प्रदान करता है. इसी संदर्भ में एक प्राचीन कथा का उल्लेख मिलता है.

    स्कंदपुराण में है आंवले के महत्व की कथा
    कावेरी नदी के उत्तर तट पर देवशर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे. वे वेद-वेदांग के ज्ञाता और अत्यंत धार्मिक पुरुष थे. उनके एक पुत्र थे, जो दुराचारी और उद्दंड स्वभाव के थे.
    देवशर्मा ने एक दिन अपने पुत्र को समझाया  ‘बेटा! यह कार्तिक महीना भगवान विष्णु को अति प्रिय है. इसमें स्नान, दान, व्रत और नियमों का पालन करो. तुलसी दल सहित भगवान विष्णु की पूजा करो, दीपदान और प्रदक्षिणा करो, ताकि तुम्हारा जीवन पवित्र हो.’ परंतु वह दुष्ट पुत्र पिता की बातों से क्रोधित हो उठा और बोला – “पिताजी! मैं कार्तिक मास में कोई पुण्य कर्म नहीं करूंगा. यह सब करने के मेरे दिन नहीं हैं.

    पुत्र की यह अधार्मिक बात सुनकर देवशर्मा क्रोध से बोले, ‘अरे मूर्ख! तू वृक्ष के खोखले में रहने वाला चूहा बन जा. पिता से ऐसा श्राप पाकर डरे हुए बेटे ने क्षमा मांगी और पूछा, पिताजी! इस नीच योनि से मेरी मुक्ति कैसे होगी?’ देवशर्मा ने कहा- ‘जब तुम भगवान विष्णु को प्रिय कार्तिक व्रत का माहात्म्य सुनोगे, उसी क्षण तुम्हारा उद्धार हो जाएगा.’

    कार्तिक माहात्म्य सुनकर मिला दिव्य लोक

    पिता का वचन सुनते ही वह ब्राह्मणपुत्र चूहे के रूप में वन में रहने लगा. वर्षों तक वह इसी रूप में रहा. एक दिन कार्तिक मास में विश्वामित्र ऋषि अपने शिष्यों के साथ उसी वन में आए. उन्होंने स्नान किया, भगवान विष्णु की पूजा की और आंवले की छाया में बैठकर अपने शिष्यों को कार्तिक मास का माहात्म्य सुनाने लगे. उसी समय वहां एक  शिकारी आया, जो प्राणियों का वध करने वाला था. वह पहले तो ऋषियों को मारने की सोचने लगा, लेकिन उनके दर्शन से उसके भीतर शुभ भावना जाग उठी. उसने विश्वामित्रजी से पूछा — “महात्मन! आप लोग यहां क्या कर रहे हैं?”

    ऋषि ने कहा- ‘कार्तिक मास सब महीनों में श्रेष्ठ है. इस महीने में जो स्नान, दान और पूजन करता है, उसका फल अक्षय होता है जैसे बरगद का बीज विशाल वृक्ष बनता है.” जब विश्वामित्रजी कार्तिक माहात्म्य का वर्णन कर रहे थे, तब पास ही बैठे चूहे (शापित ब्राह्मणपुत्र) ने वह कथा सुनी. कथा सुनते ही वह तत्काल चूहे का शरीर त्यागकर दिव्य रूप में प्रकट हो गया.

    उसने विश्वामित्र को प्रणाम किया, अपना परिचय और पूर्व जन्म का वृत्तांत बताया. ऋषि की आज्ञा लेकर वह दिव्य विमान में बैठकर स्वर्गलोक को चला गया. यह कथा बताती है कि आंवले का पूजन और कार्तिक मास का व्रत कितना महान फल देने वाला है. इसके स्मरण, दर्शन और सेवन मात्र से पाप नष्ट होते हैं और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. इसलिए अक्षय नवमी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा, उसकी छाया में भोजन और भगवान विष्णु की आराधना जीवन में आरोग्य, ऐश्वर्य और मुक्ति का अक्षय वरदान देती है.

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