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    महागठबंधन ने बिछाई बिसात, मोदी ने खींच दी सियासी लकीर… सबके केंद्र में कर्पूरी ठाकुर क्यों?

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    महागठबंधन ने बिछाई बिसात, मोदी ने खींच दी सियासी लकीर… सबके केंद्र में कर्पूरी ठाकुर क्यों?


    बिहार विधानसभा चुनाव के लिए महागठबंधन ने गुरुवार को आरजेडी नेता तेजस्वी यादव को सीएम और मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम का चेहरा घोषित कर अति पिछड़े वोटों को साधने की बिसात बिछाई. इसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को भारत रत्न और जननायक कर्पूरी ठाकुर के गांव ‘कर्पूरी ग्राम’ से बिहार में अपने चुनावी अभियान का शंखनाद किया. इस तरह से पीएम मोदी ने कर्पूरी ठाकुर पर अपने भाषण को केंद्रित कर अति पिछड़े वर्ग के लिए बड़ी सियासी लकीर खींचते नज़र आए.

    पीएम मोदी ने कहा कि मैं कर्पूरी ग्राम भी गया और उनको नमन करने का अवसर मिला. उन्हीं का आशीर्वाद है कि मेरे जैसे और नीतीश जी जैसे पिछड़े और ग़रीब परिवारों से निकले लोग इस मंच पर खड़े हैं. उन्होंने कहा कि आज़ाद भारत में सामाजिक न्याय लाने में, ग़रीब-वंचितों को नए अवसर से जोड़ने में भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर की भूमिका बहुत बड़ी रही है.

    बिहार चुनाव अभियान का आग़ाज़ कर्पूरी ठाकुर की सरज़मीं से कर पीएम मोदी ने अति पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की भावनाओं को एनडीए के साथ जोड़े रखने का दांव चला है. बिहार में अति पिछड़ा वर्ग काफ़ी अहम है, जो किसी भी दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताक़त रखता है. इसीलिए पीएम मोदी से लेकर महागठबंधन तक की नज़र इसी वोटबैंक पर है, जिसके लिए सभी सियासी दलों के केंद्र में कर्पूरी ठाकुर हैं.

    पीएम मोदी का कर्पूरी ठाकुर पर दांव

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    बिहार में सामाजिक न्याय के पुरोधा माने जाने वाले जननायक स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर को पीएम मोदी सरकार ने भारत रत्न से नवाजा था. मोदी सरकार ने यह फ़ैसला 2024 के चुनाव से ठीक पहले लिया था. अब पीएम मोदी ने बिहार विधानसभा चुनाव अभियान की शुरुआत कर्पूरी ठाकुर के गांव से करके सियासी संदेश देने की कवायद करते हुए नज़र आए.

    पीएम मोदी ने कहा कि हमने आरक्षण को 10 साल के लिए आगे बढ़ाया। पहले डॉक्टर की पढ़ाई के लिए अखिल भारतीय कोटा होता था, उसमें पहले पिछड़ों और ग़रीबों को आरक्षण नहीं था. ये जो संविधान लेकर गुमराह करते हैं, उन्होंने कुछ नहीं किया. यह प्रावधान एनडीए सरकार ने किया. कर्पूरी ठाकुर मातृभाषा में पढ़ाई के बहुत बड़े हिमायती थे. एनडीए सरकार ने नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषा में पढ़ाई पर बल दिया है. अब ग़रीब का बेटा भी अपनी भाषा में पढ़ाई कर सकता है और परीक्षा दे सकता है.

    बीजेपी की पहली रैली से पीएम मोदी यह संदेश देते नज़र आए कि जिस कांग्रेस ने जननायक कर्पूरी ठाकुर को हमेशा अपमानित किया, उसी कांग्रेस का साथी बनकर राजद विधानसभा चुनाव लड़ रही है. इस तरह नरेंद्र मोदी कर्पूरी ठाकुर को याद कर अति पिछड़ा वोटरों को अपने पाले में करने का सियासी दांव चलते नज़र आए.

    अति पिछड़ों के मसीहा कर्पूरी ठाकुर

    जननायक कर्पूरी ठाकुर देश के पहले नेता थे, जिन्होंने मंडल कमीशन लागू होने से पहले बिहार में ओबीसी समाज को आरक्षण देने का क्रांतिकारी क़दम उठाया था. इसके चलते उन्हें बिहार में सामाजिक न्याय का मसीहा माना जाता है. अति पिछड़ा वर्ग से आने वाले कर्पूरी ठाकुर ने बिहार की राजनीति में अपनी पहचान जननायक नेता के तौर पर बनाई. उनकी सादगी और ईमानदार राजनीति के चलते आज सभी दलों में ख़ुद को कर्पूरी ठाकुर का अनुयायी बताने की होड़ लगी है.

    बिहार की सियासत में कर्पूरी ठाकुर का नाम अति पिछड़ी जातियों के वोटों को साधने का एक ज़रिया बन गया है. नीतीश कुमार ने कर्पूरी ठाकुर के अनुयायी बताकर बिहार में अति पिछड़े वर्ग पर अपनी मज़बूत पकड़ बनाई थी, लेकिन अब ढीली पड़ती नज़र आ रही हैय

    अति पिछड़े वर्ग के वोटों पर नज़र जन सुराज से लेकर महागठबंधन तक की है, तो एनडीए की तरफ़ से नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की जोड़ी एक साथ कर्पूरी ठाकुर के गाँव से चुनावी अभियान का आग़ाज़ कर बड़ी सियासी लकीर खींचने की कवायद करते नज़र आए.

    बिहार में अति पिछड़ा वर्ग का वोटबैंक

    बिहार में अति पिछड़े वर्ग की आबादी 36 फ़ीसदी है, जिसमें क़रीब 114 जातियां शामिल हैं. आबादी के लिहाज़ से यह कहा जा रहा है कि सत्ता की चाबी अब अति पिछड़ी जाति के हाथों में है. अति पिछड़ी जातियों में केवट, लुहार, कुम्हार, कानू, धीमर, रैकवार, तुरहा, बाथम, मांझी, प्रजापति, बढ़ई, सुनार, कहार, धानुक, नोनिया, राजभर, नाई, चंद्रवंशी, मल्लाह जैसी 114 जातियां अति पिछड़े वर्ग में आती हैं.

    अति पिछड़े समाज की आर्थिक, सामाजिक स्थिति कमज़ोर होने के अलावा भी आबादी का बड़ा हिस्सा होने के बाद भी सियासी प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है। छोटी-छोटी जातियाँ, जिनकी आबादी कम है, लेकिन चुनाव में फ़िलर के तौर पर वे काफ़ी अहम हो जाती हैं., जब किसी दूसरे वोटबैंक के साथ जुड़ जाती हैं तो एक बड़ी ताक़त बन जाती हैं। इसीलिए सभी दलों की कोशिश अति पिछड़ी जाति के वोट को पाने की है.

    कर्पूरी ठाकुर ने सबसे पहले अति पिछड़े वर्ग के अधिकार को संरक्षित रखने के लिए क़ानूनी पहल की थी. 1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने 26 फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान किया था. इस आरक्षण में पिछड़े वर्ग और अति पिछड़े वर्ग को दो भागों में बांटा गया था. कानू, कुम्हार, मल्लाह, निषाद, कहार, बढ़ई जैसे अति पिछड़े वर्ग को 12 फ़ीसदी और पिछड़े वर्ग (यादव, कुर्मी, कोइरी) को 8 फ़ीसदी का आरक्षण दिया गया था.

    महागठबंधन ने सहनी पर खेला दांव

    बिहार की सियासत में अति पिछड़ी जाति की ताक़त और उस पर एनडीए की मज़बूत पकड़ को देखते हुए महागठबंधन ने भले ही तेजस्वी यादव को सीएम का चेहरा घोषित किया हो, लेकिन डिप्टी सीएम का चेहरा अति पिछड़ी जाति से आने वाले मुकेश सहनी को बनाया है. इस तरह ओबीसी के लिए तेजस्वी यादव को आगे किया तो मुकेश सहनी के ज़रिए अति पिछड़ी जाति को साधने की रणनीति मानी जा रही है. 

    मुकेश सहनी केवट जाति से आते हैं, जो बिहार में अति पिछड़ी जाति में सबसे बड़ी आबादी वाली जाति है. क़रीब तीन फ़ीसदी केवल ‘सहनी’ वोट हैं, जो मल्लाह, बिंद, सहनी, कश्यप, निषाद जैसी उपनामों से जानी जाती हैं। यह बिहार में एनडीए का कोर वोटबैंक माना जाता है, जिसे सेंधमारी करने के लिए ही महागठबंधन ने मुकेश सहनी के नाम को आगे बढ़ाया है.

    सहनी के जवाब में पीएम का काउंटर प्लान

    महागठबंधन की सहनी पॉलिटिक्स को काउंटर करने का दांव पीएम मोदी अपनी पहली रैली में चलते नज़र आए. मल्लाह वोटों को साधने के लिए उन्होंने कहा कि कभी बिहार को दूसरे राज्यों से मछली मंगवानी पड़ती थी, मैंने 2013 में ही कहा था कि बिहार में इतना पानी है तो बाहर से मछली क्यों मँगाएँ। हमने 2014 में सरकार में आते ही ‘पीएम मत्स्य योजना’ शुरू की.

    पीएम मोदी ने कहा कि हमने मछली पालकों को भी किसान क्रेडिट कार्ड दिया और मैं नीतीश कुमार का अभिनंदन करता हूं कि बीते एक दशक में बिहार में मछली उत्पादन दोगुना हो गया है. आज बिहार बड़ी मात्रा में मछली दूसरे राज्यों को बेच रहा है. इस तरह पीएम मोदी मल्लाह समुदाय को सियासी संदेश देते नज़र आए कि उनका विकास एनडीए सरकार में हो सकता है, महागठबंधन सिर्फ़ ठगने का काम करता है. 

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