डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत में लोगों के मन में अमेरिका के प्रति नाराजगी की भावना है. इससे दोनों देशों के बीच वर्षों से चली आ रही कूटनीतिक दोस्ती को ठेस पहुंची है. इंडिया टुडे-सीवोटर्स के ‘मूड ऑफ द नेशन सर्वे’ के मुताबिक 54% लोगों ने ट्रेड डील पर बात नहीं बनने लिए अमेरिकी सरकार को जिम्मेदार ठहराया. साथ ही, 61% लोगों का मानना है कि भारत को वाशिंगटन के साथ व्यापार वार्ता जारी रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करना चाहिए.
सर्वे में शामिल लगभग दो-तिहाई लोगों ने अमेरिका में भारतीय निर्यात पर भारी टैरिफ लगाए जाने पर चिंता जताई. हालांकि, कई लोगों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में इतना लचीलापन है कि यह इस तरह के झटकों को सहन कर सकती है. विशेषज्ञों का भी कहना है कि शुरुआती कुछ दिनों के प्रभाव को छोड़कर, टैरिफ से भारत की अर्थव्यवस्था को वास्तविक नुकसान संभवतः न्यूनतम होगा.
यह सर्वे 1 जुलाई से 14 अगस्त तक आयोजित किया गया, जिसमें भारत के सभी लोकसभा क्षेत्रों से 54,788 लोगों ने हिस्सा लिया. इसके अलावा, पिछले 24 हफ्तों में CVoter के रेगुलर ट्रैकर के तहत 152,038 इंटरव्यू का विश्लेषण भी किया गया, जिससे जवाब देने वालों का टोटल सैम्पल साइज 206,826 तक पहुंच गया.
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ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारत से आयात पर 25% प्राइमरी टैरिफ और 25% एडिशनल टैरिफ लगाया. भारत के खिलाफ ये टैरिफ दरें एशिया में किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे अधिक हैं. इसका कारण भारत का रूस से तेल आयात को जारी रखना बताया गया. हालांकि यूरोपीय संघ रूसी गैस का सबसे बड़ा खरीददार है और चीन रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है. ट्रंप ने चीन के लिए टैरिफ की अभी घोषणा नहीं की है, वहीं यूरोपीय संघ पर केवल 15% टैरिफ लगाया है. सर्वे में 69% लोगों ने कहा कि भारत को अमेरिकी दबाव की परवाह किए बिना रूस से रियायती कच्चा तेल खरीदना जारी रखना चाहिए. हाल की रिपोर्टों के अनुसार, सितंबर में रूस से भारत आने वाले तेल शिपमेंट में वृद्धि होने की उम्मीद है.
चीन के साथ हाल के संबंधों पर, 52% लोगों का मानना है कि इससे भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सात साल बाद शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन यात्रा से दोनों देशों के बीच संबंध और मजबूत होने की उम्मीद है. गौरतलब है कि चीन 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद दोनों देश के रिश्तों में आई कड़वाहट के बावजूद भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार बना हुआ है.
घरेलू स्तर पर, मोदी सरकार के ‘वन नेशन, वन पोल’ और ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ को जनता का मजबूत समर्थन मिला है. सर्वे के अनुसार, 65% लोग यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में हैं, जबकि केवल 17% इसका विरोध करते हैं. वन नेशन, वन पोल के विचार को भी समान रूप से मजबूत समर्थन मिला है.
इंडिया टुडे-सीवोटर्स का ‘मूड ऑफ द नेशन सर्वे’ दिखाता है कि भले ही ट्रंप के टैरिफ ने भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव पैदा किया हो, लेकिन भारतीय जनता को अपनी अर्थव्यवस्था की ताकत पर भरोसा है. साथ ही, रूस से तेल खरीदने और चीन के साथ संबंधों को लेकर भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है.
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