बिहार की सियासत में आज़ादी के बाद से लेकर अस्सी के दशक के आख़िर तक कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन मंडल पॉलिटिक्स के राजनीतिक उभार के बाद वह सत्ता से बाहर हो गई. अब साढ़े तीन दशक के बाद कांग्रेस अपने खिसके जनाधार को दोबारा जोड़ने की कोशिश कर रही है, जिसके लिए राहुल गांधी से लेकर प्रियंका गांधी तक उतर गए हैं.
तेजस्वी यादव के साथ इन दिनों राहुल गांधी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के ज़रिए बिहार की सड़कों की खाक छान रहे हैं. राहुल गांधी बिहार में पूरी तरह देसी अंदाज में पॉलिटिक्स कर रहे हैं. राहुल यात्रा के दौरान कभी बुलेट पर सवारी करते हैं तो कभी मखाना के खेत में उतरकर लोगों से बात करते नज़र आते हैं, तो कभी गले में गमछा डालकर देसी स्टाइल में बिहार के लोगों को लुभाते नज़र आ रहे हैं.
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बिहार में राहुल गांधी अलग अंदाज और तेवर में लोगों के साथ कनेक्शन बना रहे हैं, जिससे कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता पूरी तरह जोश में हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी 16 दिन की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के ज़रिए बिहार में कांग्रेस के 35 साल के सियासी सूखे को खत्म कर पाएंगे?
बिहार में राहुल गांधी का अलग अंदाज
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 17 अगस्त को बिहार के सासाराम से अपनी 16 दिवसीय ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का आगाज़ किया था. इस यात्रा का समापन पटना में एक सितंबर को होगा. अब यात्रा का काफिला जैसे-जैसे अपनी मंजिल की तरफ बढ़ा, वैसे-वैसे राहुल गांधी बिहार के रंग में उतरते गए. राहुल ने अपनी दो सप्ताह की यात्रा में लोगों का दिल जीतने के लिए पूरे देशी अंदाज और रूप अख्तियार कर लिया. यही नहीं, राहुल गांधी कई ऐसे लोगों को अपने मंच पर बुलाकर संबोधित कराते नज़र आए, जिनके नाम वोटर लिस्ट से कट गए हैं. साथ ही गमछा लहराकर लोगों को संबोधित करते हैं.
राहुल गांधी-तेजस्वी यादव को सुनने वालों का उत्साह ज़बरदस्त देखने को मिल रहा है. चुनाव आयोग और बीजेपी को सीधे या फिर परोक्ष रूप से राहुल गांधी ने अपने निशाने पर ले रखा है. हाथों में तिरंगा और पार्टी का झंडा लिए कांग्रेसी कार्यकर्ता धूप और उमस भरी गर्मी के बीच भी लगातार राहुल गांधी के साथ चल रहे हैं. साथ ही राहुल के साथ पार्टी कार्यकर्ता ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ का जमकर नारा लगाकर उत्साह भर रहे हैं. इस तरह से बिहार के सियासी माहौल को पूरी तरह से कांग्रेसमय बना दिया है.
राहुल गांधी की यात्रा का रोडमैप
राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ बिहार के 23 ज़िलों से गुज़रेगी और 1300 किलोमीटर का सफ़र तय करेगी. सासाराम से शुरू होकर औरंगाबाद, गया, नालंदा, नवादा, शेखपुरा, लखीसराय, मुंगेर, भागलपुर, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, सुपौल, मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, बेतिया, गोपालगंज, सीवान, छपरा और आरा के रास्ते पटना पहुंचेगी.
राहुल की यात्रा का रोडमैप बहुत ही रणनीति के साथ बनाया गया है, जिसमें बीजेपी से लेकर जेडीयू और चिराग पासवान व जीतनराम मांझी का मज़बूत गढ़ आता है. एक तरह से इसे एनडीए का दुर्ग माना जाता है. इसके अलावा, मुस्लिम बहुल क्षेत्र सीमांचल के इलाके से होते हुए यात्रा आगे बढ़ी और मिथिलांचल होते हुए भोजपुर के ज़रिए पटना पहुंचेगी. इस तरह राहुल गांधी की 17 अगस्त को सासाराम से शुरू हुई इस यात्रा ने बिहार की सियासत में भूचाल ला दिया है.
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राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के नेताओं खासकर आरजेडी के तेजस्वी यादव के साथ इस यात्रा ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और बिहार का सियासी माहौल गरमा दिया है. राहुल गांधी की यात्रा का असर बिहार के ग्रामीण इलाकों में साफ़ दिख रहा है. सासाराम से सीवान तक जिस भी इलाके से यात्रा गुज़री है, वहां उनकी सभाओं में युवाओं और महिलाओं की भारी भीड़ ने कांग्रेस को नई ताकत दी है. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने अपनी दो दिन की बिहार यात्रा में सुपौल-सीतामढ़ी तक महिला वोटरों को साधने में अहम भूमिका निभाई.
यात्रा से सधेगी सोशल इंजीनियरिंग?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का शंखनाद सासाराम ज़िले से किया, जो दलितों का गढ़ है. बाबू जगजीवन राम और फिर उनकी बेटी मीरा कुमार यहीं से सांसद चुनी जाती रहीं. मुस्लिमों की तरह दलित भी बिहार में कांग्रेस का बड़ा वोटबैंक रहा है. वहीं, मिथिलांचल के इलाके में राहुल के साथ प्रियंका गांधी भी उतरीं.
मिथिला का इलाका ब्राह्मण बहुल माना जाता है. कांग्रेस के दौर में ब्राह्मणों का बिहार की सियासत में दबदबा था, उसमें भी मिथिलांचल के, वो चाहे जगन्नाथ मिश्रा हों या भागवत आज़ाद झा. कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के बाद कोई भी ब्राह्मण सीएम नहीं बन सका. इस तरह से कांग्रेस अपने परंपरागत कोर वोटबैंक ब्राह्मणों को साधने की कवायद करती नज़र आई.
राहुल गांधी की यात्रा ने दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वोटरों को लामबंद किया है. कांग्रेस का दावा है कि 65 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जिनमें ज़्यादातर गरीब और दलित हैं. यह मुद्दा बीजेपी के वोटबैंक, खासकर ग्रामीण और युवा मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है. बीजेपी ने जवाब में नीतीश कुमार और पीएम मोदी के विकास मॉडल को आगे रखा है, लेकिन राहुल की यात्रा ने उनके हिंदुत्व कार्ड को भी चुनौती दी है, खासकर प्रियंका की जानकी मंदिर पूजा के बाद. यात्रा ने सियासी समीकरण को उलट-पुलट कर रख दिया है. ऐसे में क्या कांग्रेस बिहार में अपना पुराना मुकाम हासिल कर पाएगी?
क्या कांग्रेस 35 साल का वनवास खत्म कर पाएगी?
आज़ादी के बाद से लेकर 1990 के दशक तक बिहार में कांग्रेस का बोलबाला रहा, लेकिन सियासत ने ऐसी करवट ली कि पूरी राजनीति बदल गई. कांग्रेस सत्ता से बाहर होने के चलते लगातार कमज़ोर होती चली गई और उसकी छवि पिछलग्गू की बन गई. बिहार में कांग्रेस की स्थिति को पिछले तीन लोकसभा चुनावों और विधानसभा चुनावों के नतीजों से समझा जा सकता है.
कांग्रेस 20 साल से बिहार में 10 फ़ीसदी वोट तक हासिल नहीं कर सकी है. पिछले तीन विधानसभा चुनावों के नतीजों और वोट शेयर पर भी ग़ौर करें तो कांग्रेस बिहार में सिर्फ़ संघर्ष करती नज़र आ रही है. 2010 के चुनाव में कांग्रेस सिर्फ़ 4 सीटों पर सिमट गई थी और वोट शेयर 8.37 फ़ीसदी रहा. 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 41 सीटों पर लड़कर 27 सीटों पर जीत दर्ज की, लेकिन वोट शेयर घटकर 6.66 फ़ीसदी रह गया. इसके बाद 2020 के चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 9.48 फ़ीसदी पहुंचा, लेकिन 19 विधायक ही जीत सके. इस तरह से कांग्रेस 10 फ़ीसदी वोट तक नहीं पहुंच पाई.
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वहीं, पिछले तीन लोकसभा चुनावों की बात करें तो बिहार में कांग्रेस कोई कमाल नहीं कर पाई. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बिहार में 2 सीटों पर जीत मिली और वोट शेयर 8.6 फ़ीसदी रहा. 2019 में कांग्रेस 1 सीट पर ही सिमट गई थी और वोट शेयर घटकर 7.9 फ़ीसदी रह गया. राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद भी बिहार में कांग्रेस का कोई ख़ास असर नहीं दिखा. 2024 के लोकसभा चुनाव में 3 सीटें जीतीं और वोट शेयर 9.4 फ़ीसदी रहा. इस तरह कांग्रेस बिहार में अपने सियासी वजूद को बचाए रखने के लिए आरजेडी की पिछलग्गू बनकर रह गई.
2025 में क्या खत्म होगा 35 साल का वनवास
राहुल गांधी ने बिहार में कांग्रेस की स्थिति को 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद ही समझ लिया था, जब उनकी सिर्फ़ 3 सीटें आई थीं. राहुल ने उसके बाद से सियासी एक्सरसाइज़ शुरू कर दी थी और खुद लगातार एक के बाद एक दौरे शुरू कर दिए थे. राहुल ने आरजेडी के साथ गठबंधन बरकरार रखते हुए कांग्रेस को मज़बूत करने की रूपरेखा बनाई ताकि प्रदेश में आत्मनिर्भर बन सके.
कांग्रेस ने 2025 के चुनाव से पहले अपना बिहार अध्यक्ष बदल दिया. भूमिहार समाज से आने वाले अखिलेश प्रसाद को हटाकर दलित समुदाय से आने वाले राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी. राहुल ने अपने करीबी कृष्णा अल्लावरू को बिहार का प्रभारी बनाया तो साथ में दलित समाज से आने वाले सुशील पासी को सह-प्रभारी बनाया. इसके अलावा, शहनवाज़ आलम को भी सह-प्रभारी के रूप में नियुक्त किया. इसके अलावा, कन्हैया कुमार और पप्पू यादव को भी एक्टिव करके सियासी तपिश बढ़ाई और अब चुनाव से ठीक पहले राहुल गांधी बिहार के रणभूमि में उतर गए हैं.
राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद ‘वोटर अधिकार यात्रा’ को लेकर राज्य के नेताओं और कार्यकर्ताओं में उत्साह देखने को ज़रूर मिल रहा है और भीड़ भी जुट रही है. ऐसे में राहुल गांधी की यात्रा का बिहार विधानसभा चुनाव पर क्या असर पड़ेगा, क्या कांग्रेस का 35 साल का सियासी वनवास खत्म हो पाएगा? ये चुनावी नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन राहुल ने बिहार की सियासत में हलचल ज़रूर पैदा कर दी है. इस हलचल ने बीजेपी और जेडीयू दोनों बेचैन कर दिया है.
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