लाल कालीन बिछी, स्वागत की घंटियां बजीं, और दुनिया की नजरें टिकीं चीन के तिआनजिन पर. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात साल बाद चीन की धरती पर कदम रखा है. यह कोई साधारण दौरा नहीं बल्कि वह मंच है जहां न केवल एशिया, बल्कि वैश्विक सत्ता संतुलन की नई इबारत लिखी जा रही है. शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी, चीन के तिआनजिन पहुंचे तो उनका ग्रैंड वेलकम हुआ.
प्रधानमंत्री के तिआनजिन के एक होटल में पहुंचने पर भारतीय समुदाय के लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. भारतीय प्रवासियों ने ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाए. वहीं चीनी कलाकारों ने पीएम मोदी के सामने भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य का प्रदर्शन किया. एससीओ समिट से इतर पीएम मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी करेंगे. इस दौरान राष्ट्रपति पुतिन के दिसंबर में प्रस्तावित भारत दौरे पर भी चर्चा होगी.
US टैरिफ के बीच भारत की कूटनीति बिसात
पीएम मोदी का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब पूरी दुनिया अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ नीतियों से जूझ रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के 50 फीसदी टैरिफ के बाद पीएम मोदी के इस चीन दौरे से भारत ने कूटनीति की नई बिसात बिछाई है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ वन-टू-वन मीटिंग और पुतिन के साथ द्विपक्षीय वार्ता से तय होगा कि दुनिया की धुरी क्या होगी. अमेरिका और यूरोप इस ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं. पीएम मोदी का ये दौरा सिर्फ एक बहुपक्षीय बैठक तक सीमित नहीं है. इसमें छिपा है दुनिया की कूटनीति का नया अध्याय.
यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया को दो खेमों में बांट दिया है. रूस से पश्चिम दूर जा चुका है. अमेरिका के साथ पहले से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है. ऐसे में SCO के मंच से रूस, भारत और चीन, अमेरिका और यूरोप दोनों को बड़ा संदेश देने में कामयाब हो सकते हैं. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. पुतिन और मोदी की मुलाकात भी तय है. वहीं, पीएम मोदी और शी जिनपिंग की वन-टू-वन मीटिंग पर दुनिया की नजर होगी. दोनों नेता चीनी धरती पर 7 साल बाद आमने-सामने होंगे.
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भारत सिर्फ दर्शक नहीं निर्णायक खिलाड़ी है
अब सवाल उठते हैं कि क्या एशिया की धुरी में भारत, चीन और रूस एक साथ खड़े होंगे? क्या इस दौरे से अमेरिका के साथ रिश्ते बदल जाएंगे? क्या लद्दाख, डोकलाम से लेकर अरुणाचल तक सीमा पर तनाव खत्म होगा? या फिर हमेशा की तरह मोदी कूटनीति का वही मंत्र अपनाएंगे कि न किसी के खिलाफ, न किसी के साथ, बल्कि सबके साथ. ग्लोबल पॉलिटिक्स का असली खेल यही है. 21वीं सदी का नया केंद्र अब वाशिंगटन या मास्को नहीं बल्कि एशिया है. और तिआनजिन में मोदी की मौजूदगी इस बात का सबूत है कि भारत अब सिर्फ दर्शक नहीं बल्कि निर्णायक खिलाड़ी बनना चाहता है.
शंघाई सहयोग संगठन में 10 सदस्य देश हैं- चीन, भारत, ईरान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और बेलारूस. बेलारूस आधिकारिक तौर पर जुलाई 2024 में 10वें सदस्य के रूप में शामिल हुआ. चीन की अपनी यात्रा से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने जापान के प्रतिष्ठित अखबार ‘योमिउरी शिंबुन’ (Yomiuri Shimbun) को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि भारत और चीन के बीच स्थिर और सौहार्दपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों का क्षेत्रीय और वैश्विक शांति एवं समृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. इस वक्त दुनिया यह देख रही है कि भारत की रणनीति क्या है? ऐसे में तिआनजिन का मंच सिर्फ कूटनीति नहीं बल्कि भविष्य की वैश्विक राजनीति की बिसात है.
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