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    गणेशजी के प्रथम पूज्य होने का क्या है रहस्य… सिर्फ एक प्रतियोगिता जीतने से नहीं मिला था यह सम्मान

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    श्रीगणेश भारतीय समाज में सबसे स्वीकार्य देवताओं में से एक हैं. इनकी स्वीकार्यता का विस्तार इतना अधिक है कि आप भले ही किसी भी देवता की पूजा या आराधना करें, शुरुआत आपको गणपति स्थापना और पूजा से ही करनी होगी. यह बात सिर्फ पूजा-पाठ तक ही नहीं सीमित है. गणेशजी की मौजूदगी हर कार्य के होने और उसके सफल रूप से संपूर्ण और सम्पन्न हो जाने तक में है. सनातन परंपरा में जो पंच ‘गं’ यानी बीज अक्षर के आधारित पांच आधार हैं, उनमें भी श्री गणेश पहले हैं. बाकी इनके बाद, गौ, गंगा, गीता और गायत्री हैं.

    पंच देवों में भी प्रथम हैं श्रीगणेश

    पंच देवों में भी गणेश पहले हैं. जिनका क्रम गणपित, शिव, काली, विष्णु और सूर्य हैं. इस तरह श्रीगणेश को शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. गणेशजी के पौराणिक-प्राचीन नामों में से एक नाम ‘प्रणव’ है. प्रणव को ही प्रथम अक्षर कहा जाता है. जो अ यानी अकार, उ यानी उकार, म यानी मकार का संयुक्त स्वरूप होकर ओंकार बन जाता है. गणेश जी की स्वीकृत और जानी-पहचानी मुखाकृति इसी ओंकार का निर्माण भी करती है. वह बायीं ओंर से घुमाकर लाते हुए अपनी सूंड को दायीं ओर घुमा लेते हैं तो वह ऊं अक्षर से मिलती-जुलती सी आकृति में लगते हैं.

    केतु से कैसे जुड़ जाते हैं श्रीगणेश

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गणेशजी को केतु के रूप में जाना जाता है. यह संबंध इसलिए स्थापित किया गया है क्योंकि गणेशजी का सिर काटकर उनकी जगह हाथी का सिर लगाया गया था, जो बिना सिर वाले केतु की स्थिति को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है. केतु को ज्ञान, आध्यात्मिकता और परिवर्तन से जोड़ा जाता है, और गणेश जी की पूजा से केतु दोषों को शांत करने और बाधाओं से मुक्ति पाने में सहायता मिलती है.

    केतु एक छाया ग्रह है, जो राहु छाया ग्रह से हमेशा विरोध में रहता है. यह इस बात का प्रतीक है कि बिना विरोध के ज्ञान नहीं आता है और बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं है. गणेशजी की मान्यता इस बात में है कि उनकी मौजूदगी सर्वत्र है. श्रीगणेश प्रथम पूज्य क्यों हैं और किसी कार्य को करने को श्रीगणेश करना क्यों कहा जाता है?

    ब्रह्मांड का प्रथम अक्षर हैं श्रीगणेश

    असल में गणेश जी द्वारा माता-पिता की परिक्रमा करके प्रथम पूज्य बनने की कथा के अलावा उनका नाम पहले लिए जाने के पीछे कई लौकिक तर्क भी हैं. गणेशजी ओंकार स्वरूप हैं और ऊं ही ब्रह्नांड का पहला अक्षर है. अक्षरों के समूह को गण कहा जाता है और श्रीगणेश इनके भी स्वामी हैं. ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना शुरू कि तो उन्होंने ओम के साथ ही सभी मंत्रों का उच्चारण की. इस तरह श्री गणेश ओम के उच्चारण के साथ हर शुरुआत के प्रतीक बन गए.

    सभी तरह के श्रम में हैं श्रीगणेश

    असल में गणेशजी ही साधन, साध्य और साधक भी है, इसलिए वह कार्य के सफलता के साथ पूर्ण होने का आश्वासन हैं. वह पूर्णता का विश्वास हैं. गणेश अगर साधन हैं तो संसार के प्रत्येक कण-कण में वह विद्यमान है. उदाहरण के लिये जो साधन है वही गणेश हैं, जीवन जीने के लिए भोजन के लिए अनाज की जरूरत होती है, जीवन को चलाने का साधन अनाज है, तो अनाज गणेश हैं. अनाज को पैदा करने के लिये किसान भी गणेश हैं. किसान को अनाज बोने और निकालने के लिये बैलों की जरूरत है तो बैल भी गणेश हैं. खेत, खेती और खेती से प्राप्त उत्पाद आदि सभी गणेश हैं. अनाज के भंडारण का स्थान भी गणेश हैं. अनाज के घर में आने के बाद पीसने वाली चक्की भी गणेश हैं.

    आटे से बनने वाली रोटी, रोटी बनने के लिए बेलन-चिमटे जैसे सभी साधन भी गणेश हैं. जो भी साधन जीवन में प्रयोग किये जाते हैं, और हमारी जो भी आजीविका और धन हैं. वे सभी गणेश हैं.

    श्रीगणेश अकेले शंकर पार्वती के पुत्र और देवता ही नहीं बल्कि सनातन परंपरा प्रथम पूज्य होने के साथ हर कार्य विशेष में ही प्रथम हैं और संपूर्णता के प्रतीक हैं. इसीलिए वह श्रीगणेश हैं.

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