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    महावतार नरसिम्हा देख ली, लेकिन क्या आप जानते हैं कौन हैं इनसे जुड़े शरभ, गंडभेरुंड और देवी प्रत्यंगिरा के अवतार?

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    महावतार नरसिम्हा देख ली, लेकिन क्या आप जानते हैं कौन हैं इनसे जुड़े शरभ, गंडभेरुंड और देवी प्रत्यंगिरा के अवतार?


    सिनेमा हॉल में पौराणिक किरदार और कथानक पर बनी एक एनिमेशन फिल्म इस वक्त धूम मचा रही है. भक्त प्रह्लाद और दैत्य हिरण्यकशिपु की पौराणिक कहानी पर बनी फिल्म, ‘महावतार नरसिम्हा’ चर्चा का विषय बनी हुई है.  फिल्म का कलेवर, सधी हुई कहानी और शानदार VFX लोगों को खूब भा रहे हैं और बहुत ही खामोशी से थिएटर्स में रिलीज हुई ये फिल्म व्यूवर्स की अटेंशन हासिल कर रही है. 

    कैसे शांत हुआ था भगवान नरसिंह का क्रोध
    खैर, ये फिल्म इतनी ही भर नहीं है. अगर आप थिएटर में महावतार नरसिम्हा देख आए हैं तब तो आपके लिए ये जानना और रोचक हो सकता है कि नरसिंह भगवान का क्रोध आखिर में शांत कैसे हुआ? हालांकि फिल्म में दिखाया गया है, प्रहलाद की करुण पुकार और उसकी भावपूर्ण स्तुति से भगवान नरसिंह का क्रोध शांत हो जाता है. 

    लेकिन, असल में ऐसा नहीं है. अलग-अलग पुराणों में इस कथा को और विस्तार दिया गया है. भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार का वर्णन, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, मत्स्य पुराण और शिव पुराण में भी आता है, लेकिन शिवपुराण में यह कथा कुछ और आगे बढ़ती है, जहां नरसिंह अवतार के कारण ही महादेव शिव को उससे भी भयानक अवतार लेना पड़ता है.

    शिवजी ने लिया था भयानक अवतार
    कहानी कुछ ऐसी है कि, हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद जब भगवान् नरसिंह का क्रोध शांत नही हुआ था, तो उन पर नियंत्रण लगाने के लिए शिवजी ने भयानक अवतार लिया. जिसे शरभ कहा गया है. भगवान शिव का यह अवतार दो गरुड़ पंख, शेर के पंजे, सिंह मुख के साथ बना था. उनके मस्तक पर जटाएं थीं और चंद्रमा भी. उनका यह अवतार इतना विशाल था कि इस अवतार ने नरसिंह भगवान को पंजो में जकड़ लिया और आकाश में लेकर उड़ चले. उड़ते हुए शरभ ने बार-बार नरसिंह के ऊपर चोंच से प्रहार किया.

    गुस्साए नरसिंह ने लिया और भीषण क्रोधी अवतार
    उनके ऐसा करने से भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को और ज्यादा क्रोध आ गया. नरसिंह ने अपने ही शरीर को फाड़ दिया और उसके भीतर से नया अवतार लिया. यह गंडभेरुंड अवतार था. यह दो पक्षी के मुख वाला था और दोनों ही गरुण मुखी थे.  लंबे विशालकाय सुनहले पंख वाले गंडभेरुंड ने अब शरभ को अपने पंजों में जकड़ लिया और तेजी से आकाश की लेकर उड़ चला. शरभ और गंडभेरुंड के इस महायुद्ध के कारण संसार में त्राहि-त्राहि मच गई, क्योंकि ये सिर्फ शिव या विष्णु के अवतारों का युद्ध नहीं था, ये सृष्टि के दो प्रधान तत्वों के बीच का टकराव था, दो महाशक्तियों की लड़ाई भी थी. 

    फिर देवी ने लिया प्रत्यंगिरा का अवतार
    ये युद्ध किसी भी तरह से टलता हुआ, रुकता हुआ नहीं दिख रहा था. यहीं से शुरुआत हुई एक और नए अवतार की. देवी लक्ष्मी दूर खड़ी यह सब देख रही थीं. देवी लक्ष्मी को पुराणों में माया कहा गया है. पार्वती, दुर्गा, सरस्वती इसी माया के अलग-अलग नाम हैं. बल्कि देवी भागवत पुराण और विष्णु धर्मेत्तर साहित्य ऐसा मानता है कि त्रिदेव भी देवी के ही अधीन हैं. 

    देवी लक्ष्मी ने अपनी आत्मिक तीनों शक्तियों (दुर्गा और सरस्वती) को खुद में समाहित किया. फिर उन्होंने रुद्र और विष्णु की चेतना शक्ति को भी समाहित किया. ऐसा होते-होते देवी लक्ष्मी का पूरा शरीर अग्नि की तरह दहकने लगा और उनकी मुखाकृति बदलने लगी. पहले वह सौम्य से भयानक हुई और देखते-देखते देवी का चेहरा किसी शेरनी में बदल गया. उनका शरीर स्त्री का रहा, लेकिन हाथ शेर के पंजों की तरह हो गए. पूंछ सर्प की तरह हो गई, पंख गरुड़ की तरह हो गए. वह एक ही बार में नरसिंही, शिवानी, वैष्णवी, रुद्राणी का सम्मिलित अवतार हो गईं. 

    कैसा है देवी प्रत्यंगिरा का स्वरूप?
    देवी के इस स्वरूप के प्रत्यंगिरा कहा गया है. देवी ने इस भयंकर अवतार को धारण करके अपना स्वरूप विस्तार किया और आकाश तक पहुंच गईं. उनका यह अवतार भगवान शिव के शरभ और विष्णुजी के नरसिंह अवतार से ही मिलता-जुलता था, लेकिन इसमें उन दोनों अवतारों (नरसिंह व गंडभेरुंड) की शक्तियां भी समाई हुई थीं.  प्रत्यंगिरा देवी का रूप धारण करके देवी लक्ष्मी जो आदिशक्ति भी हैं, शरभ और गंडभेरुंड को नियंत्रित किया. उन्होंने ऐसी हुंकार भरी कि शरभ और गंडभेरुंड दोनों ही भयभीत हो गए और लड़ना छोड़ दिया. तब देवी ने दोनों को अपने एक-एक हाथ में पकड़ा और धरती पर ले आईं. देवी के संपर्क में आने से शिवजी और विष्णु जी की चेतना वापस आ गई और दोनों ही अपने असली स्वरूप में आ गए. इस प्रकार इन दोनों का युद्ध समाप्त हुआ.

    Devi Pratyangira
    देवी प्रत्यंगिरा, जिन्हें देवी निकुम्भला, नारसिंही भवानी और अपराजिता नाम से भी जाना जाता है.

    देवी प्रत्यंगिरा को अपराजिता, निकुम्भला, भद्रकाली आदि नामों से जाना जाता है. रावण के कुल की आराध्या देवी प्रत्यंगिरा ही थीं. मेघनाद ने देवी प्रत्यंगिरा के निकुंभला स्वरूप को ही प्रसन्न कर, दिव्य रथ, बाण, धनुष, तरकष और तलवार प्राप्त की थी. देवी निकुंभला का एक विशेष यज्ञ था, जिसे अगर मेघनाद पूरा कर लेता तो वह अजेय हो जाता, लेकिन लक्ष्मणजी ने इससे पहले ही उसका वध कर दिया और यज्ञ को रोक दिया. 

    देवी प्रत्यंगिरा नारायण तथा शिव दोनों की विनाशकारी शक्ति रखती हैं. उनका शेर और मानव रूपों का यह संयोजन अच्छाई और बुराई के संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है. इन्हें अघोर लक्ष्मी, सिद्ध लक्ष्मी, पूर्ण चन्डी, अथर्वन भद्रकाली आदि नामों से भी भक्तों द्वारा संबोधित किया जाता है.

    शिल्प और मूर्तिकला में गंडभेरुंड
    वहीं, दूसरी ओर गंडभेरुंड या गंडभिरुंड की बात करें तो इसकी छवि दक्षिण भारतीय मूर्तिकला और शिल्प में विस्तार से देखी जा सकती है. यह पक्षी अपनी विशिष्ट दो सिर वाली आकृति के साथ शाही और धार्मिक कला का हिस्सा रहा है. विजयनगर साम्राज्य (1336-1646) के सिक्कों, मुहरों और स्थापत्य में गंडभिरुंड की मौजूदगी दिखाई देती है. उदाहरण के लिए, हम्पी के कुछ खंडहरों में इसकी नक्काशी देखी जा सकती है. मैसूर पैलेस की दीवारों और सजावट में गंडभिरुंड को सुनहरे और रंगीन चित्रों में उकेरा गया है, जो वोडेयार राजवंश की शक्ति और वैभव का प्रतीक चिह्न भी है. कर्नाटक के पारंपरिक हस्तशिल्प, जैसे कासुती कढ़ाई और चंदन की नक्काशी, में भी गंडभेरुंड की आकृतियां नजर आती हैं. कर्नाटक राज्य के राज्य चिह्न में भी गंडभेरुंड की मौजूदगी है.

    Gandabherunda
    कर्नाटक सरकार के राज्यचिह्न में बीच में गंडभेरुंड का अंकन

    शरभ अवतार की प्रतिमाएं और मूर्तियां
    शरभ अवतार की बात करें तो दक्षिण भारत के कई राज्यों में प्राचीन मंदिरों में शरभ की मौजूदगी प्रतिमाओं-मूर्तियों या फिर दीवारों पर उकेरी गई नक्काशी में दिख जाती है. तमिलनाडु के कुम्भकोणम के निकट विक्रमचोलेश्वरम मंदिर जो 12वीं शताब्दी की शुरुआत (1118–1135 ई.) से संबंधित है, यहां शरभ की नक्काशी दिख जाती है. चोल राजवंश के दौरान भी शरभ की प्रतिमाएं बनाई गईं, क्योंकि चोल राजवंश शैव मत का केंद्र रहा है और यहां शिव और उनके अलग-अलग स्वरूपों की बहुत महत्ता रही है.

    कैसा है शरभ का स्वरूप?
    श्रीलंका में एक प्राचीन मंदिर है, श्री मुन्नेश्वरम मंदिर. इस मंदिर की दीवारों पर एक दैवीय नक्काशी यूं ही अपनी ओर आकर्षित करती है, जो शरभ की है. इसका शरीर घोड़े की तरह है, लेकिन इसके आठ पैर हैं, जो चार-चार के क्रम में आगे और पीछे हैं. घोड़े के धड़ के ऊपर से निकली मानवीय गर्दन है, लेकिन इसका चेहरा चपटा है और शेर की तरह है. इसकी पूंछ पर सर्पिल आकार की है, शरीर पर सर्प लिपटे हैं. मस्तक पर चांद दिख रहा है, एक हाथ में त्रिशूल, एक में गदा, एक में अंकुश दिख रहा है. घोड़े के दो विशाल पंख हैं. सर्प, त्रिशूल और चांद का होना इस जीव का जुड़ाव शिवजी से दिखाता है. इसकी पूजा शर्भेस्वर नाम से की जाती है. शरभ के पैरों में नरसिंह अवतार को फंसा हुआ और डरा हुआ दिखाया जाता है. ये प्रतिमा शरभ और नरसिंह के उसी पौराणिक युद्ध के बारे में बताती है. 

    फिल्म को किया जा रहा है पसंद
    खैर, होम्बाले फिल्म्स ने अपने एनिमेटेड माइथोलॉजिकल यूनिवर्स के ब्लूप्रिंट के साथ ‘महावतार नरसिम्हा’ अनाउंस की थी. टीजर और ट्रेलर के अलावा इस फिल्म की कोई खास बड़ी मार्केटिंग या प्रमोशन नहीं नजर आया. ये कुछ वैसी ही प्रमोशन स्ट्रेटेजी थी जैसी होम्बाले फिल्म्स ने 2018 में यश स्टारर ‘KGF’ और ऋषभ शेट्टी की ‘कांतारा’ के लिए इस्तेमाल की थी. कंटेंट को अपना काम करने दिया गया और लिमिटेड स्क्रीन्स के साथ फिल्म रिलीज की गई. लोगों के बीच फिल्म को अच्छी खासी माउथ पब्लिसिटी मिल रही है.
     

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