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    तारिक के आने से यूनुस होंगे OUT? समझें- खालिदा के बेटे की बांग्लादेश वापसी के भारत के लिए क्या मायने

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    तारिक के आने से यूनुस होंगे OUT? समझें- खालिदा के बेटे की बांग्लादेश वापसी के भारत के लिए क्या मायने


    जिस बांग्लादेश को भारत ने साल 1971 के युद्ध में पाकिस्तान से आजादी दिलाई थी, उस बांग्लादेश के साथ आज भारत के रिश्ते नाज़ुक मोड़ पर हैं. बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर बढ़ते अत्याचार और भारत विरोधी भावनाओं के बीच बड़ा सवाल यही है कि बांग्लादेश अब किधर जाएगा. ये सवाल आज और जरूरी इसलिए हो जाता है क्योंकि 17 वर्षों के बाद गुरुवार को तारिक रहमान की बांग्लादेश में घर वापसी हुई है. 60 साल के तारिक रहमान पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं.

    आज से 17 साल पहले 2008 में जब तारिक रहमान बांग्लादेश छोड़कर लंदन गए थे, तब उन पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोप थे. ये भी कहा जाता है कि उस वक्त तारिक रहमान ने बांग्लादेश से बाहर निकलने के लिए सेना की मदद ली. उन्होंने उस वक्त की कार्यवाहक सरकार को एक शपथपत्र सौंपा, जिसमें ये गारंटी दी गई कि वो बांग्लादेश की राजनीति में वापस कभी नहीं लौटेंगे. इस शपथ पत्र को बांग्लादेश ने आजतक संभाल कर रखा है. लेकिन तारिक रहमान ने अपनी कसम तोड़ दी है. वो ना सिर्फ 17 साल बाद अपने परिवार के साथ लंदन से बांग्लादेश वापस लौट आए हैं बल्कि अब उन्हें प्रधानमंत्री पद का सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है. इतने वर्षों बाद जब तारिक रहमान अपने परिवार के साथ बांग्लादेश की राजधानी ढाका लौटे, तब एक लाख से ज्यादा लोगों ने उनका स्वागत किया.

    तारिक रहमान ने अपनी वतन वापसी को ‘पिक्चर-परफेक्ट’ दिखाने के लिए बांग्लादेश की जमीन को छूकर उसका नमन भी किया और अपने देश की मिट्टी को अपनी मुट्ठी में बंद करके अपने समर्थकों का जोश भी बढ़ाया.इसे समय का ही चक्र कहेंगे कि आज जिस जगह तारिक रहमान खड़े हैं, उस जगह 17 साल पहले पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीन खड़ी थीं. साल 2008 में जब तारिक रहमान ने बांग्लादेश छोड़ा, तब शेख हसीन को बांग्लादेश की सेना और कार्यवाहक सरकार दोनों का समर्थन मिला था. इसी समर्थन से शेख हसीना 2009 से 2024 तक लगातार 15 साल बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं लेकिन अब ये स्थिति पूरी तरह बदल गई है.

    मुजीबवाद और जियावाद की सियासत में लिपटा बांग्लादेश

    अब शेख हसीना बांग्लादेश में नहीं हैं और तारिक रहमान 17 वर्षों के बाद लंदन से बांग्लादेश लौट आए हैं. ऐसा इसलिए भी मुमकिन हो पाया क्योंकि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने तारिक रहमान पर दर्ज कई मुकदमों को वापस ले लिया और उन्हें एक नया राजनीतिक जीवनदान दिया. ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि बांग्लादेश की राजनीति अब तक दो परिवारों के हवाले रही है. इनमें शेख हसीना का परिवार मुजीबवाद पर चला है और खालिदा जिया का परिवार जियावाद पर चला है. यहां मुजीबवाद का मतलब बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब रहमान से है और जियावाद का मतलब जनरल जियाउर रहमान से है.

    26 मार्च 1971 को जब शेख मुजीब उर रहमान ने बांग्लादेश की आजादी का ऐलान किया था, तब इसकी घोषणा जियाउर रहमान ने ही की थी. ये वो दौर था, जब बांग्लादेश की राजनीति में जियावाद का प्रवेश नहीं हुआ था. इसकी पहली झलक साल 1975 के बाद देखी गई, जब सेना के कुछ अधिकारियों ने शेख मुजीब उर रहमान और उनके परिवार की हत्या करवा दी. उस वक्त शेख हसीना यूरोप में थीं इसलिए उनकी जान बच गई लेकिन यहां से बांग्लादेश की राजनीति में एक नया टर्निंग प्वॉइंट आया. जियाउर रहमान बांग्लादेश की सत्ता का केंद्र बन गए और बाद में उन्होंने सेना से अलग होकर बीएनपी नाम की पार्टी बना ली. साल 1991 में जियाउर रहमान की पत्नी खालिदा जिया पहली बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनी और कहते हैं कि इस सरकार में जिस नेता का सबसे अधिक दखल था, वो नेता खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान थे.

    उस जमाने में तारिक रहमान को बांग्लादेश की राजनीति का क्राउन प्रिंस कहा जाता था, जिन्हें खालिदा जिया के बाद बांग्लादेश की सत्ता मिलनी थी लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. तारिक रहमान ने तीन दशकों तक बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा है और आज जब वो बांग्लादेश वापस लौटे हैं, तब उन्हें सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री की कुर्सी दिख रही है. तारिक रहमान ने वतन लौटने के बाद अपने भाषण में यही कहा कि मार्टिन लूथर किंग जूनियर की तरह उनके पास भी बांग्लादेश के भविष्य के लिए एक सपना है, एक योजना है और वो इसे सबके साथ पूरा करना चाहते हैं.

    तारिक रहमान कह तो यही रहे हैं कि वो सभी धर्मों को साथ लेकर चलेंगे और वो बांग्लादेश का भला करना चाहते हैं लेकिन हकीकत में ये सारे शब्द हर नेता के शब्दकोश में होते हैं और इन शब्दों से किसी भी नेता की मंशा और मानसिकता को सही रूप में नहीं समझा जा सकता. तारिक रहमान को समझना है तो हमें ये देखना होगा कि उन्होंने पहले किस तरह की राजनीति की है.

    साल 2001 से 2006 के बीच जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री खालिदा जिया थीं, तब इस सरकार में तारिक रहमान को असली पावर सेंटर माना जाता था. ये भी आरोप लगते हैं कि उस सरकार में तारिक रहमान ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के साथ संर्पक रखा, जिसे बांग्लादेश ने अपने लिए खतरा माना था. उसी सरकार में तारिक रहमान ने कट्टरपंथी ताकतों और आतंकवादी समूहों को बढ़ावा दिया. जिस जमात-ए-इस्लामी ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान का साथ दिया था, उस जमात-ए-इस्लामी को तारिक रहमान से पूरी मदद मिली. खालिदा जिया की सरकार में तारिक रहमान के दखल के कारण जमात-ए-इस्लामी की हिंदू विरोधी गतिविधियों को नजरअंदाज किया गया और बीएनपी के राज में बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर सबसे अधिक अत्याचार हुआ.

    दागदार इतिहास वाले तारिक रहमान कितने सफल होंगे?

    साल 1992 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ, तब बांग्लादेश में खालिदा जिया की सरकार थी और तारिक रहमान का इस सरकार पर अच्छा खासा प्रभाव था. उस दौर में भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर 4000 से अधिक हमले हुए और कई हिंदू मन्दिरों को आग लगा दी गई और कई हिंदू मोहल्लों को रातों-रात खाली करा लिया गया.

    उस वक्त खालिदा जिया और उनके बेटे तारिक रहमान पर ये आरोप लगा कि उन्होंने जानबूझकर हिंदुओं के खिलाफ इस नफरती हिंसा को रोका नहीं और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों को खुली छूट दी गई ताकि वो हिंदुओं को निशाना बना सकें.

    साल 2001 से 2006 के बीच भी हिंदुओ के खिलाफ कई हिंसक घटनाएं हुईं, जिन पर अमेरिका से लेकर संयुक्त राष्ट्र ने चिंता जताई लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं के कत्लेआम को बंद नहीं किया गया. 2001 के संसदीय चुनावों में जिन हिंदुओं ने शेख हसीना की आवामी लीग को अपना वोट दिया था, उन हिंदुओं के घरों को तब आग लगा दी गई थी और कई हिंदू महिलाओं का बलात्कार भी हुआ था.

    इसके बाद सबसे बड़ी हिंसा तब भड़की, जब 17 अगस्त 2005 को 63 जिलों में 300 से ज्यादा जगहों पर आधे घंटे के अंदर करीब 500 बम धमाके किए गए. इसकी जिम्मेदारी आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिद्दीन ने ली थी लेकिन तब भी खालिदा जिया की सरकार ने कोई एक्शन नहीं लिया या यूं कहिए कि तारिक रहमान पर आरोप था कि वो हिंसा फैलाने वाली ताकतों का समर्थन कर रहे थेच

    तारिक रहमान पर ये भी आरोप लगता हैं कि उन्होंने उस दौर में भारत विरोधी भावनाओं को काफी भड़काया और इस दौरान भारत और बांग्लादेश की सेना के बीच कुछ सैन्य संघर्ष भी हुए. इनमें अप्रैल 2001 में मेघालय और असम की सीमा पर भारत और बांग्लादेश की सेना के बीच झड़पें हुईं, जिनमें भारत के 16 जवान शहीद हो गए. इसके बाद दोनों देशों के बीच हालात काफी तनावपूर्ण बने रहे. अगर बहुत दूर भी ना जाएं तो पिछले साल जब जनवरी 2024 में बांग्लादेश में इंडिया आउट अभियान चलाया गया था, तब तारिक रहमान पर ये आरोप लगे थे कि वो खुद इसका समर्थन कर रहे हैं.

    इसके अलावा अगस्त 2024 में जब शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट हुआ, तब 11 अगस्त को ऐसी मीडिया रिपोर्ट्स आई थीं कि तारिक रहमान पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के अधिकारियों से मिल रहे हैं और इसके लिए वो लंदन से मिडिल ईस्ट के किसी देश में भी आए थे. ये बात सही है कि तारिक रहमान आजकल अपने भाषणों में ये कहते हैं कि उन्हें दिल्ली और रावलपिंडी से पहले बांग्लादेश का ख्याल है. लेकिन सिर्फ इस बयान के आधार पर ये नहीं माना जा सकता है कि वो भारत के लिए अच्छे साबित होंगे.यहां असल में सवाल तो ये होना चाहिए कि मोहम्मद यूनुस और तारिक रहमान में भारत के लिए ज़्यादा बुरा कौन है और भारत कैसे बांग्लादेश के साथ अपने रिश्तों में तनाव कम कर सकता है.

    वैसे तारिक रहमान के लिए घर वापसी की तरह सत्ता वापसी भी आसान नहीं होगी. बांग्लादेश में इस वक्त हालात इतने खराब हैं कि वहां हिंसा का दौर थमता नहीं दिख रहा है. एक दिन पहले बांग्लादेश की राजधानी ढाका में अज्ञात लोगों ने पेट्रोल बम से हमला किया, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और उसके बाद ढाका यूनिवर्सिटी की मधुर कैंटीन में तोड़फोड़ हुई, जिसका संबंध 1971 के लिबरेशन वॉर से माना जाता है. 

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