प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए दो दिवसीय यात्रा पर चीन के तिआनजिन शहर पहुंचे. यह उनकी 7 साल बाद पहली चीन यात्रा है. तिआनजिन में 31 अगस्त और 1 सितंबर को होने वाले इस वार्षिक सम्मेलन में 10 सदस्य देशों के नेता हिस्सा लेंगे.
पीएम मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ रविवार को होने वाली द्विपक्षीय बैठक को भारत-चीन संबंधों में हालिया सुधार के मद्देनजर खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इसके अलावा, 1 सितंबर को पीएम मोदी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ भी द्विपक्षीय वार्ता करेंगे. यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी को लेकर भारत और अमेरिका के बीच तनाव देखा जा रहा है.
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ट्रंप प्रशासन ने भारतीय निर्यात पर 25% टैरिफ लगाया है और रूसी तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त 25% टैरिफ थोपा है. अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन नई दिल्ली बीजिंग के साथ संवाद बनाए रखकर अपने विकल्पों को विविधता देने की कोशिश में है. पीएम मोदी की यह यात्रा भारत-चीन संबंधों में एक संभावित नई शुरुआत का संकेत देती है.
Landed in Tianjin, China. Looking forward to deliberations at the SCO Summit and meeting various world leaders. pic.twitter.com/gBcEYYNMFO
— Narendra Modi (@narendramodi) August 30, 2025
दोनों देशों के रिश्ते 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद निचले स्तर पर पहुंच गए थे, लेकिन हाल के कूटनीतिक प्रयासों से विश्वास बहाली की सतर्क कोशिश दिख रही है. चीन तनावपूर्व रिश्तों के बावजूद, भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है. वहीं, मैन्युफैक्चरिंग पावर बनने की भारत की महत्वाकांक्षाएं चीनी कच्चे माल पर निर्भर हैं. शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन का वैश्विक महत्व भी है.
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आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद से निपटने के लिए स्थापित यह 10 सदस्यीय संगठन अब पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाली संस्थाओं और संगठनों के विकल्प के रूप में उभर रहा है. इस शिखर सम्मेलन में भारत की भागीदारी यह दर्शाती है कि वह किसी एक गठबंधन पर अत्यधिक निर्भर हुए बिना कई मंचों पर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहता है. हालांकि, उम्मीदें संयमित हैं.
चीन के पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ सैन्य संबंधों और हिंद महासागर में उसकी बढ़ती मौजूदगी को लेकर भारत में लंबे समय से संदेह बना हुआ है. चीन के लिए भारत के साथ बेहतर संबंध अमेरिका के नेतृत्व वाले घेरेबंदी प्रयासों को कमजोर कर सकते हैं, जबकि भारत के लिए पश्चिम और बीजिंग दोनों के साथ साझेदारी का संतुलन बनाए रखना बढ़ते ध्रुवीकरण वाले विश्व में उसकी गुट-निरपेक्ष नीति को दर्शाता है.
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