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    ‘ट्रिपल T’ से जापान संग गहरे होंगे भारत के रिश्ते, समझें- ट्रंप टैरिफ के बीच पीएम मोदी का दौरा क्यों अहम

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    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वार्षिक शिखर सम्मेलन (29-30 अगस्त)  के लिए जापान की यात्रा पर जाएंगे. ये दौरा भारत-जापान के लिए बेहद अहम माना जा रहा है. दरअसल, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर तनाव बना हुआ है, ऐसे में भारत, जापान के साथ अपने आर्थिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है. दोनों देश मिलकर व्यापार, तकनीक और निवेश के नए अवसर खोजने की दिशा में काम करने पर ध्यान दे रहे हैं. ये यात्रा सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि एशिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक ताकतें रणनीतिक और सुरक्षा मामलों से लेकर वैश्विक स्तर पर भी साथ आ रही हैं.

    भारत और जापान के रिश्ते गहरे, ऐतिहासिक विश्वास और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित हैं. ये साझेदारी समय के साथ लगातार मजबूत हुई है. उच्च स्तर के आपसी संवाद ने रिश्ते को नई दिशा दी है. 2007 में तत्कालीन प्रधानमंत्री दिवंगत शिंजो आबे का ‘दो समुद्रों का संगम’ भाषण भारतीय संसद में दिया जाना ऐतिहासिक क्षण था. इसके बाद 2013 में जापान के सम्राट अकिहितो और महारानी मिचिको ने भारत की यात्रा की, जो किसी जापानी सम्राट की पहली यात्रा थी. 2014 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि बने और 2019 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद सम्राट नारुहितो के राज्याभिषेक समारोह में शामिल हुए.

    हाल के वर्षों में जापान के प्रधानमंत्री किशिदा ने भारत में 5 ट्रिलियन येन (42 अरब अमेरिकी डॉलर) निवेश का वादा किया. साथ ही क्लीन एनर्जी पार्टनरशिप की शुरुआत की और औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने पर जोर दिया.

    प्रधानमंत्री मोदी जापान की कूटनीतिक गतिविधियों में लगातार शामिल रहे हैं. मई 2023 में उन्होंने हिरोशिमा में G-7 शिखर सम्मेलन में भाग लिया और पीस पार्क के पास गांधी प्रतिमा का अनावरण किया. उसी साल सितंबर में नई दिल्ली में G-20 शिखर सम्मेलन के दौरान G-7 और G-20 प्राथमिकताओं पर जापान के साथ समन्वय किया. इसके बाद 2024 में इटली में G-7 बैठक, लाओस में आसियान शिखर सम्मेलन में दोनों नेताओं की मुलाकात हुई. ये नियमित बातचीत दिखाती है कि जापान की यह यात्रा कोई अलग घटना नहीं हैं, बल्कि एक गहरी और लगातार बढ़ती साझेदारी का हिस्सा है.

    अमेरिका के साथ बढ़ते आर्थिक तनाव के बीच भारत के लिए जापान की अहमियत और भी बढ़ गई है. इसे इन बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है.

    1. निवेश में भरोसा: जापान भारत का पांचवां सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) सोर्स है, जो दिसंबर 2024 तक 43 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश कर चुका है. सिर्फ2 साल में इस्पात, EV, अर्धचालक और नवीकरणीय ऊर्जा में 13 बिलियन डॉलर के 170 से ज्यादा करार हुए हैं.

    2. सप्लाई चेन में मजबूती: सप्लाई चेन रेजिलिएंस इनीशिएटिव के जरिए दोनों देश चीन पर निर्भरता घटा रहे हैं, खासकर अर्धचालक, रेयर अर्थ और ईवी बैटरी जैसे क्षेत्रों में.

    3. टेक्नोलॉजी ट्रांसफर: टोयोटा, सुजुकी, निप्पॉन स्टील जैसी कंपनियां भारत में उन्नत संयंत्र लगा रही हैं, जिससे छोटे-मंझोले उद्योग ग्लोबल सप्लाई चेन से जुड़ रहे हैं. इसके जरिए निर्यात और गुणवत्ता बढ़ रही है.

    4. एनर्जी और स्थिरता: जापान की स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाएं- जैसे ओसाका गैस की ग्रीन हाइड्रोजन और गुजरात के बायोगैस प्लांट भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जलवायु लक्ष्यों को सहयोग दे रही हैं.

    बुनियादी ढांचे से इनोवेशन तक

    – इशिबा शिखर सम्मेलन में आर्थिक सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, डिजिटल टेक्नोलॉजी और लोगों से जुड़े सहयोग पर जोर दिया जाएगा.

    – 1958 से जापान भारत का सबसे बड़ा विकास सहयोगी है. उसने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन, मेट्रो और कई शहरी प्रोजेक्ट्स में निवेश किया है. 2023-24 में जापान से भारत को 4.5 बिलियन डॉलर की आधिकारिक विकास सहायता मिली है.

    – 2023-24 में दोनों देशों का व्यापार 22.8 बिलियन डॉलर तक पहुंचा. इसमें मशीनरी और इस्पात का आयात प्रमुख रहा. भारत में करीब 1400 जापानी कंपनियां 5000 यूनिट्स चला रही हैं, जबकि 100 से अधिक भारतीय कंपनियां जापान में मौजूद हैं.

    – 2025-26 को विज्ञान, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन एक्सचेंज का वर्ष घोषित किया गया है. इसमें AI, रोबोटिक्स, अर्धचालक और अंतरिक्ष क्षेत्र (इसरो-जाक्सा सहयोग) पर खास ध्यान रहेगा.

    शिक्षा, जनसांख्यिकी और मानव संसाधन में तालमेल

    जनसांख्यिकी पूरकता: भारत-जापान सहयोग का एक अहम पहलू शिक्षा और मानव संसाधन है. जापान में वृद्ध होती जनसंख्या और श्रम की कमी है, जबकि भारत के पास बड़ी युवा आबादी और पेशेवरों का विशाल भंडार है. यह साझेदारी स्वाभाविक रूप से कौशल और प्रतिभा पर केंद्रित है.

    शैक्षणिक सहयोग: दोनों देशों के विश्वविद्यालयों के बीच 665 से अधिक अकादमिक संबंध हैं. एडु-कनेक्ट, टैलेंट ब्रिज और स्किल कनेक्ट जैसे कार्यक्रमों के ज़रिए अगले 5 साल में 50000 छात्रों और पेशेवरों का आदान-प्रदान लक्ष्य है. इसमें एआई, अर्धचालक, रोबोटिक्स और स्वच्छ ऊर्जा प्रमुख क्षेत्र होंगे.

    रोज़गार और तकनीकी सहयोग: जापान अपने वैश्विक R&D केंद्रों के लिए भारतीय इंजीनियरों की भर्ती कर रहा है. उदाहरण के लिए फुजित्सु 9000 इंजीनियर नियुक्त करेगा. निडेक बेंगलुरु में सॉफ्टवेयर केंद्र बना रहा है और मुसाशी सेइमित्सु भारतीय ग्रेजुएट्स के साथ EV पार्ट्स डेवलप कर रहा है.

    स्पेशल प्रोग्राम: टेक्निकल ट्रेनिंग इंटर्न प्रोग्राम (TITP) और स्पेसिफिक स्किल्ड वर्कर इनीशिएटिव (SSW) भारतीय युवाओं को प्रशिक्षित कर जापानी उद्योगों से जोड़ते हैं. जापानी कंपनियां भाषा और सांस्कृतिक प्रशिक्षण में निवेश कर एकीकरण सुनिश्चित करती हैं.

    रक्षा, सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टिकोण

    भारत और जापान अपनी हिंद-प्रशांत रणनीतियों में तेज़ी से एक-दूसरे के साथ जुड़ रहे हैं. भारत की एक्ट ईस्ट और हिंद-प्रशांत महासागर पहल (IPOI), जापान की फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक (FOIP) से मेल खाती हैं. दोनों देश क्वाड के प्रमुख सदस्य हैं और मालाबार, JIMEX, धर्म गार्जियन जैसे सैन्य अभ्यास कर रहे हैं. आपसी रक्षा समझौते (जैसे 2020 का लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट और 2024 का यूनिकॉर्न नौसैनिक मस्तूल सह-विकास) आपसी विश्वास को गहरा करते हैं. नियमित 2+2 वार्ता ने जापान को भारत का अहम सुरक्षा साझेदार बना दिया है.

    सांस्कृतिक और मानवीय संबंध 

    सांस्कृतिक कूटनीति भी रिश्तों की मज़बूत नींव है. 2023-24 टूरिज़्म एक्सचेंज ईयर ने हिमालय और माउंट फ़ूजी को जोड़ने का प्रतीकात्मक अवसर दिया. हिरोशिमा में गांधी प्रतिमा का अनावरण साझा शांति मूल्यों का प्रतीक है. जापान में बसे लगभग 54000 भारतीय- मुख्यतः पेशेवर और इंजीनियर दोनों समाजों और अर्थव्यवस्थाओं के बीच सेतु का कार्य कर रहे हैं.

    पीएम मोदी की जापान यात्रा कितनी अहम?

    प्रधानमंत्री मोदी की टोक्यो यात्रा सिर्फ़ औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि भारत एशिया में भरोसेमंद साझेदारी को और मज़बूत करना चाहता है. जापान की तकनीक और निवेश, भारत के बड़े बाज़ार और युवाओं के साथ मिलकर एक अनोखा सहयोग बना रहे हैं. शिंकानसेन रेल, सेमीकंडक्टर, बायोगैस और छात्र आदान-प्रदान जैसे प्रोजेक्ट न सिर्फ़ दोनों देशों के विकास को आगे बढ़ाते हैं, बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र को भी दिशा देते हैं. अमेरिका के अनिश्चित व्यापार माहौल के बीच जापान, भारत को एक लंबे समय का भरोसेमंद साथी साबित कर रहा है.

    —- समाप्त —-



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