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    Kali Jayanti 2025: काली जयंती है आज, जानें पूजन का शुभ मुहूर्त और मां काली की उपासना विधि

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    Kali Jayanti 2025: काली जयंती है आज, जानें पूजन का शुभ मुहूर्त और मां काली की उपासना विधि


    Kali Jayanti 2025: मां काली, मां दुर्गा का सबसे प्रचंड रूप माना जाता है. चित्रों में मां काली को हमेशा एक भयावह रूप में ही चित्रित किया जाता है, जिसमें वे मानव खोपड़ियों की माला, विच्छेदित भुजाओं से बने निचले वस्त्र पहनती हैं और उन्हें लंबी जीभ के साथ दिखाया जाता है. ये उनकी उस शक्ति का प्रतीक है जो बुराई एवं अंधकार को खत्म कर सच्चाई और न्याय की स्थापना करती है. हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को हर साल काली जयंती का पर्व मनाया जाता है और इस बार काली जयंती 15 अगस्त यानी आज मनाई जा रही है.

    काली जयंती 2025 शुभ मुहूर्त (Kali Jayanti 2025 Shubh Muhurat)

    काली जयंती की अष्टमी तिथि 15 अगस्त यानी आज रात 11 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 16 अगस्त यानी कल रात 9 बजकर 34 मिनट पर होगा.

    पूजन का मुहूर्त- मां काली का पूजन 16 अगस्त की अर्धरात्रि 12 बजकर 4 मिनट से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक होगा.

    काली जयंती 2025 पूजन विधि (Kali Jayanti 2025 Pujan Vidhi)

    इस दिन सबसे पहले पूजा स्थल को गंगाजल से अच्छे से शुद्ध करें. इसके बाद वहां एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं, क्योंकि ये रंग माता काली के लिए विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं. चौकी पर माता काली की मूर्ति या चित्र को स्थापित करें. ध्यान रखें कि मूर्ति या चित्र का मुख पूर्व दिशा की ओर हो. माता काली को गुड़हल के फूल और बेलपत्र बहुत प्रिय हैं, इसलिए इन फूलों का इस्तेमाल अवश्य करें. पूजा में माता जी को अक्षत, सिंदूर और ताजा पुष्प अर्पित करना शुभ माना जाता है. पूजा में काली चालीसा का पाठ करें और अंत में माता काली की आरती करें.

    काली जयंती 2025 महत्व (Kali Jayanti 2025 Significance)

    माता काली के कई अवतार हैं. बंगाल में उनका सबसे लोकप्रिय रूप ‘दक्षिणा काली’ है, जिसे लोग एक मां की तरह पूजते हैं जो अपने भक्तों की रक्षा करती हैं. इसके अलावा ‘वाम काली’, जिसे साम्हार काली भी कहा जाता है, मां काली का अत्यंत शक्तिशाली और उग्र स्वरूप है. यह रूप बुराई का नाश करने और संसार में संतुलन बनाए रखने का काम करता है. मां काली 10 महाविद्याओं में से पहली हैं और इन्हें ‘काली कुल’ परंपरा से जोड़ा जाता है.

    देवीभागवत पुराण में भी 10 महाविद्याओं का जिक्र किया गया है, जो मां महाकाली के अलग-अलग स्वरूपों को दर्शाती हैं. वहीं, ब्रह्मनीला तंत्र में भी बताया गया है कि देवी काली के दो रूप हैं- एक रक्तवर्णी और दूसरी काली. काली के काले स्वरूप को ‘दक्षिणा’ कहा जाता है जबकि रक्तवर्णी को ‘सुंदरी’ के नाम से जाना जाता है.

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